UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 14 विकसित देश के रूप में उभरता भारत (अनुभाग – तीन)

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 14 विकसित देश के रूप में उभरता भारत (अनुभाग – तीन)

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विस्तुत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास के क्षेत्र में भारत की बदलती स्थिति पर निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत व्याख्या कीजिए [2015]
(क) कृषि, (ख) उद्योग-धन्धे, (ग) जनसंख्या
या
भारत में औद्योगिक उत्पादन की वर्तमान स्थिति क्या है ?
या
कृषि में खाद्यान्न उत्पादन की बदलती स्थिति का वर्णन कीजिए।
या
भारत में शिक्षा के बदलते स्वरूप का वर्णन कीजिए।
या
भारत में प्रौढ़ शिक्षा की व्यापकता का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
भारत शिक्षा कोष के विषय में आप क्या जानते हैं ?
या
विकसित देश के रूप में उभरते हुए भारत की कृषि के क्षेत्र में किन्हीं तीन उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :

विसव में भारत की बदलती स्थिति

स्वतन्त्रता से पूर्व भारत की स्थिति एक पिछड़े हुए देश जैसी थी। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में यह बहुत पीछे था। अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति के कारण भारत के प्राचीन लघु तथा कुटीर उद्योग नष्ट हो चुके थे और हमें छोटी-छोटी चीजों के लिए भी विदेशों का मुँह ताकना पड़ता था। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत ने अपने प्राकृतिक संसाधनों को मानवीय साधनों द्वारा आर्थिक साधनों में बदलना प्रारम्भ किया और तेजी से आर्थिक विकास की ओर बढ़ने लगा। निश्चय ही आज भारत वैसा नहीं है, जैसा वह स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय था। अन्य विकासशील देशों की तुलना में वह आज निरन्तर तीव्रगति से विकास की दिशा में बढ़ रहा है। जीवन के विविध क्षेत्रों में उसने अनेक विशिष्ट परिवर्तन किये हैं तथा परिवर्तन की यह प्रक्रिया निरन्तर आगे बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप, आज भारत की गणना उन्नत देशों की श्रेणी में होने लगी है और वह दिन दूर नहीं जब भारत विकसित देशों की पंक्ति में आ जाएगा।

कृषि
कृषि में खाद्यान्न उत्पादन की बदलती स्थिति – भारत जो कुछ दशक पूर्व विश्व के प्रमुख खाद्यान्न आयातक राष्ट्रों में सम्मिलित था, अब इनके प्रमुख निर्यातक देशों में आ गया है। यह उपलब्धि भारत को चावल व गेहूँ के निर्यात से प्राप्त हुई है। भारत से चावल का निर्यात नवम्बर, 2000 ई० में तथा गेहूं का निर्यात अप्रैल, 2001 ई० में शुरू किया गया था। तीन वर्षों में ही चावल निर्यात में भारत ने विश्व में दूसरा तथा गेहूँ, निर्यात में आठवाँ स्थान प्राप्त कर लिया है। इन तीन वर्षों में भारत ने 30 देशों को गेहूँ का व 54 देशों को चावल का निर्यात किया है। वाणिज्य मन्त्रालय के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2002-03 की अवधि में भारत से ३ 1,700.18 करोड़ मूल्य का 35.70 लाख टन गेहूं का निर्यात किया गया, जबकि वर्ष 2001-02 में यह निर्यात मात्र १ 1,330.21 करोड़ का था। इस प्रकार गेहूं के निर्यात में एक वर्ष में लगभग ३ 370 करोड़ की वृद्धि हुई। इसी प्रकार वर्ष 2002-03 की अवधि में बासमती चावल का निर्यात १ 1,729.54 करोड़ तथा अन्य प्रकार के चावल का निर्यात १ 3,634.08 करोड़ था, जबकि वर्ष 2001-02 ई० में अन्य प्रकार के चावल का निर्यात मात्र १ 1,331.37 करोड़ था। इस प्रकार चावल के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि वर्ष 2002-03 में दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार दोनों ही प्रकार के चावल के निर्यात में एक वर्ष में लगभग * 4,000 करोड़ की वृद्धि हुई। सन् 1965 ई० में खाद्यान्नों का आयात 1.03 करोड़ टने था, जो वर्ष 1983-84 में मात्र 24 लाख टन रह गया। वर्ष 2000-01 में खाद्यान्नों के आयात की कोई आवश्यकता ही न रही और देश निर्यात करने की स्थिति में पहुँच गया। यह स्थिति भारतीय कृषि के बदलते स्वरूप को दर्शाती

उद्योग – धन्धे
औद्योगिक उत्पादन की वर्तमान स्थिति – नियोजन-काल की अवधि में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में औद्योगिक क्षेत्र के हिस्से में पर्याप्त वृद्धि हुई है।औद्योगिक क्षेत्र का GDP में हिस्सा जो वर्ष 1950-51 में 1993-94 ई० की कीमतों पर 13.3% था, वह रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2002-03 में बढ़कर 21.8% हो गया है। विश्वव्यापी मन्दी के चलते वित्तीय वर्ष 2002-03 की अवधि में भारत में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि की दर 5.8% रही, जब कि पूर्व वित्तीय वर्ष 2001-02 में यह दर 2.7% थी।

उद्योगों के उपयोग पर आधारित वर्गीकरण के अन्तर्गत वर्ष 2002-03 की अवधि में पूँजीगत उत्पादों में 10.4% की वृद्धि दर्ज की गयी थी। इसी प्रकार आधारभूत वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि की दर 4.8%, मध्यवर्ती उत्पादों के लिए 3.8% तथा उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में भी उत्पादन में वृद्धि की दर 6.4% रही थी। छ: आधारभूत उद्योगों-बिजली, कोयला, इस्पात, कच्चा पेट्रोलियम, पेट्रोलियम रिफायनरी उत्पाद तथा सीमेण्ट के निष्पादन में वर्ष 2002-03 की अवधि में क्रमश: 3.1, 4.3, 8.7,3.3, 4.9 तथा 8.8% वृद्धि की दर रही थी। इन छ: उद्योगों की समग्र वृद्धि दर वर्ष 2002-03 की अवधि में 5.2% रही थी। यह स्थिति भारतीय उद्योग-धन्धों के बदलते स्वरूप को दर्शाती है।

जनसंख्या
भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल विश्व का लगभग 2.4% है, किन्तु यहाँ विश्व की 17.5% जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है। भारत में जनसंख्या सम्बन्धी विभिन्न आँकड़ों की जानकारी नियमित रूप से होने वाली दस-वर्षीय जनगणना से प्राप्त होती है। भारत में पहली विश्वसनीय जनगणना 1881 ई० में हुई। उस समय भारत की जनसंख्या 23.7 करोड़ थी, जो 1991 ई० में बढ़कर 84.63 करोड़ हो गयी।, 11 मई, 2000 ई० को भारत की जनसंख्या 100 करोड़ और मई, 2011 ई० की जनगणना के अनुसार, 1,210,193,422 थी। (स्रोत: इण्टरनेट)। भारत में अब जनसंख्या वृद्धि की समस्या भयावह हो उठी है, जिसे विद्वानों ने ‘जनंसख्या विस्फोट’ की संज्ञा दी है।

वर्ष 2011 ई० की आधिकारिक जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.02 करोड़, जिसमें ग्रामीण जनसंख्या लगभग 83.3 करोड़ (68.84%) तथा शहरी जनसंख्या 37.7 करोड़ (31.16%) है। पुरुषों की संख्या 62.37 करोड़ (51.54%) तथा महिलाओं की जनसंख्या 58.64 करोड़ (48.46%) रही है। भारत में स्त्री-पुरुष अनुपात 940 : 1000 है। सर्वाधिक स्त्री-पुरुष अनुपात केरल में 1034 : 1000 तथा सबसे कम बिहार राज्य में 877 : 1000 रहा है।

पिछले दस वर्षों (2001-2011) की अवधि में जनसंख्या में कुल वृद्धि 17.64% अंकित की गयी है। वर्ष 2001-2011 की जनगणना में शहरी और ग्रामीण जनसंख्या वृद्धि दर क्रमशः 31.80% और 12.18% है। ग्रामीण जनसंख्या वद्धि दर बिहार में सबसे अधिक (23.90%) ऑकी गई है। हिमाचल प्रदेश में ग्रामीण जनसंख्या का अनुपात सर्वाधिक (89.6%) है, जबकि शहरी जनसंख्या का अनुपात दिल्ली में सर्वाधिक (97.50%) है। भारत में सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश है तथा सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम है।

शिक्षा
लोकतन्त्र की सफलता तथा समाज-देश दोनों के विकास के लिए शिक्षा का विशेष महत्त्व है। यह केवल व्यक्ति की उत्पादक क्षमता में ही वृद्धि नहीं करती, वरन् देश में अर्जित सम्पदा के समान एवं निष्पक्ष वितरण को सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाती है।

शिक्षा पर बढ़ता व्यय – शिक्षा मानव-पूँजी में निवेश किया जाने वाला महत्त्वपूर्ण साधन है। पहली पंचवर्षीय योजना से ही शिक्षा पर किये जाने वाले योजनागत व्यय में तेजी से बढ़ोतरी की गयी है। दसवीं पंचवर्षीय योजना में इस क्षेत्र को उच्च प्राथमिकता प्रदान की गयी तथा इसके लिए ३ 43,825 करोड़ का प्रावधान रखा गया, जब कि नवीं योजना में यह प्रावधान है 24,908 करोड़ का ही था। इस प्रकार इसमें 76% की वृद्धि की गयी थी। भारत शिक्षा कोष-शिक्षा क्षेत्र के लिए सभी से समर्थन प्राप्त करने तथा अतिरिक्त बजटीय संसाधनों को जुटाने के लिए एक पंजीकृत संस्था

भारत शिक्षा कोष – की स्थापना की गयी है, जिसका कार्य व्यक्तियों, केन्द्र तथा राज्य सरकारों, अप्रवासी भारतीयों तथा भारतीय मूल के व्यक्तियों से शिक्षा की विभिन्न परियोजनाओं हेतु अंशदान, चन्दा अथवा दान प्राप्त करना है।

शिक्षा : एक मौलिक अधिकार – संसद के दोनों सदनों द्वारा 93वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित हो चुका है। इसके द्वारा 6 से 14 वर्ष के आयु समूह वाले सभी बच्चों के लिए नि:शुल्क तथा अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर सभी के लिए शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु किया गया यह एक महत्त्वपूर्ण उपाय है।

साक्षरता-दर में वृद्धि – पिछले कुछ दशकों के दौरान साक्षरता-दर में पर्याप्त सुधार आया है। कुल साक्षरता-दर जो कि सन् 1951 में मात्र 18.33% थी, 1991 ई० में बढ़कर 52.21%, 2001 ई० में 65.4% तथा 2011 ई० में 74.04% हो गयी। भारत की जनगणना 2001 ई० के अनुसार पुरुषों की साक्षरता-दर 75.85% तथा महिलाओं की 54.16% हो गयी है। पिछले दशक में महिला साक्षरता दर में कहीं अधिक वृद्धि हुई है, जो पुरुषों की 11.72% की तुलना में 14.87% बढ़ी तथा इस प्रकार पुरुष-महिला साक्षरता-दर का अन्तर वर्ष 1991 की 24.84% से घटकर वर्ष 2001 में 21.7% हो गया है। यह एक अनुकूल प्रवृत्ति है, जो भारत के विकास की ओर इंगित करती है। वर्ष 2000-01 में 6 से 14 वर्ष के आयु-समूह की लगभग 193 मिलियन की जनसंख्या में से लगभग 81% बच्चे विद्यालय में उपस्थित रहे। भारत की जनगणना 2011 ई० के अनुसार पुरुषों की साक्षरता-दर 82.14% तथा महिलाओं की 65.46% हो गयी। पिछले दशक में महिला साक्षरता दर में कहीं अधिक वृद्धि हुई है।

तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा – देश में तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा ने गुणवत्तापूर्ण मानव-शक्ति उत्पन्न कर आर्थिक एवं तकनीकी विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। वर्तमान में डिग्री स्तर के 1,200 से अधिक तथा डिप्लोमा स्तर के भी 1,200 मान्यता प्राप्त इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। इनमें भारतीय I.I.Tई. का विश्व में एक उच्च स्थान है। इसके अतिरिक्त 1,000 से अधिक संस्थान मास्टर ऑफ कम्प्यूटर एप्लीकेशन (MCA) पाठ्यक्रम की शिक्षा प्रदान करते हैं। एम०बी०ए० पाठ्यक्रम की शिक्षा प्रदान करने वाले 930 मान्यताप्राप्त प्रबन्धन संस्थान हैं।

शैक्षिक कार्यक्रम – भारत में साक्षरता-दर में वृद्धि के लिए अनेक शैक्षिक कार्यक्रम चलाये गये हैं, जिनमें अनौपचारिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, अल्पसंख्यकों को शिक्षा तथा सर्वशिक्षा अभियान आदि प्रमुख हैं। छ: से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए प्रारम्भिक शिक्षा को एक मूलभूत अधिकार बनाने के लिए संसद ने संविधान अधिनियम, 2002 पारित किया है। इस अधिनियम को लागू करने के लिए ‘सर्व शिक्षा अभियान’ योजना विकसित की गयी है। इसे नवम्बर, 2002 ई० से आरम्भ किया गया है। इस अभियान के निम्नलिखित लक्ष्य हैं(1) छ: से चौदह वर्ष तक की आयु के सभी बच्चे स्कूल/शिक्षा गारण्टी योजना केन्द्र/ब्रिज कोर्स में जाएँ। (2) सन् 2007 तक सभी बच्चों की 5 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा तथा सन् 2010 तक 8 वर्ष की स्कूली शिक्षा पूर्ण हो जाए। (3) जीवन के लिए शिक्षा पर बल देते हुए प्राथमिक शिक्षा पर बल दिया जाए। (4) सन् 2007 तक प्राथमिक स्तर पर सभी लड़के-लड़कियों और सामाजिक वर्ग के अन्तरों को तथा प्रारम्भिक शिक्षा-स्तर पर 2010 ई० तक समाप्त किया जाए और (5) सन् 2010 तक बीच में पढ़ाई छोड़ने वालों की संख्या को शून्य किया जाए।

प्रौढ़ शिक्षा – देश के 600 जिलों में से 587 जिलों को अब प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों में सम्मिलित कर लिया गया है। इस समय 174 जिलों में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान, 212 जिलों में साक्षरता पश्चात् कार्यक्रम और 201 जिलों में अनवरत शिक्षा कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह स्थिति भारतीय शिक्षा के बदलते स्वरूप की परिचायक है।

प्रश्न 2.
भारत के कपड़ा उद्योग तथा लौह-इस्पात उद्योग का वर्णन कीजिए।
या
भारत में कपड़ा उद्योग की बदलती स्थिति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2009]
या
भारत में बढ़ते हुए उद्योगों की स्थिति पर निम्नलिखित शीर्षकों पर निबन्ध लिखिए
(क) वस्त्रोद्योग, (ख) लोहा एवं इस्पात उद्योग, (ग) पेट्रोलियम उद्योग, (घ) रसायन उद्योग।
उत्तर :
कपड़ा उद्योग/वस्त्रोद्योग – 
कपड़ा उद्योग भारत का सबसे बड़ा, संगठित एवं व्यापक उद्योग है। यह देश के औद्योगिक उत्पादन का 14%, सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2.4%, कुल विनिर्मित औद्योगिक उत्पादन का 20% व कुल निर्यात के 23% की आपूर्ति करता है। भारत इस क्षेत्र में चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ प्रतियोगिता रखता है।

पंचवर्षीय योजनाएँ इस उद्योग के लिए वरदान सिद्ध हुईं, जिनके फलस्वरूप न केवल इस उद्योग का पर्याप्त विकास हुआ, अपितु अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भी यह अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा। सरकार ने ‘कपड़ा
आदेश’, 1993 ई० के माध्यम से इस उद्योग को लाइसेन्स मुक्त कर दिया। 31 मार्च, 1999 ई० को देश में 1,824 सूत/कृत्रिम धागों की मिलें थीं, जिनमें से अधिकतर मिलें महाराष्ट्र, तमिलनाडु तथा गुजरात में हैं। भारत का वस्त्रोद्योग मुख्यतः सूत पर आधारित रहा है तथा देश में कपड़े की खपत का 58% भाग सूत से ही सम्बद्ध है। भारत का वस्त्र उद्योग अब पटसन एवं सूती वस्त्रों के अतिरिक्त कृत्रिम रेशों से पर्याप्त मात्रा में वस्त्र तैयार करता है तथा सिले-सिलाये वस्त्रों को विदेशों को निर्यात कर रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारत के सिले वस्त्रों की बड़ी माँग है तथा उसे इससे १ 51 हजार करोड़ से भी अधिक मूल्य की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

लोहा एवं इस्पात उद्योग – आज भारत विश्व का नौवाँ सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश है। इस उद्योग में । 90,000 करोड़ की पूँजी लगी हुई है और पाँच लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है। बड़े पैमाने पर इस्पात का उत्पादन 1907 ई० में जमशेदपुर में टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (TISCO) की स्थापना के साथ आरम्भ हुआ। सन् 1974 में सरकार ने स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लि० (SAIL) की स्थापना की।

दूसरी पंचवर्षीय योजना में 10-10 लाख टन इस्पात पिण्डों की क्षमता की सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाएँ भिलाई (छत्तीसगढ़) में सोवियत संघ के सहयोग से, दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) में ग्रेट ब्रिटेन के सहयोग से
और राउरकेला (ओडिशा) में जर्मनी के सहयोग से स्थापित की गयी।

तीसरी पंचवर्षीय योजना में सोवियत संघ के सहयोग से बोकारो (बिहार) में एक और इस्पात कारखाने की स्थापना की गयी। विगत कुछ वर्षों में इस्पात उद्योग के उत्पादन का स्वरूप सन्तोषप्रद रहा है। वर्ष 2002-03 में इस्पात की खपत 29.01 मिलियन टन थी, जब कि वर्ष 2001-02 में यह 27.35 मिलियन टन थी। वर्ष 2001-02 में तैयार इस्पात का निर्यात 1.27 मिलियन टन था जो वर्ष 2002-03 में 1.5 मिलियन टन हो गया। लोहे और इस्पात से बनी सभी वस्तुओं के आयात और निर्यात की वर्तमान में पूरी छूट है। वर्ष 2001-02 में परिष्कृत इस्पात का निर्यात 2.98 मिलियन टन था, जो वर्ष 2002-03 में बढ़कर 4.2 मिलियन टन हो गया। यह स्थिति लोहे और इस्पात उद्योग में भारत की परिवर्तित होती स्थिति को प्रदर्शित करती है।

पेट्रोलियम उद्योग – पेट्रोलियम के सम्बन्ध में भारत की स्थिति अब पहले की अपेक्षा अच्छी हुई है। द्वितीय पंचवर्षीय योजना के आरम्भ तक देश में केवल डिगबोई (असोम) के आस-पास के क्षेत्र में तेल निकाला जाता था। अब देश के कई भागों से तेल निकाला जाने लगा है। भारत के तेल-क्षेत्र असोम, त्रिपुरा, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, मुम्बई, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, केरल के तटीय प्रदेशों तथा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में स्थित हैं। देश में तेल का कुल भण्डार 13 करोड़ टन अनुमानित किया गया है।

वर्ष 1950-51 में देश में कच्चे तेल का उत्पादन केवल 2.5 लाख टन था, जब कि वर्ष 2002-03 की अवधि में उत्पादन 33.05 मिलियन टन रहा। खाद्यान्न व दूध के उत्पादन में आत्मनिर्भरता के पश्चात् अब खनिज तेल की दिशा में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के लिए कृष्ण क्रान्ति (Black Revolution) की सरकार की योजना है। इसके लिए एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाकर पेट्रोल में इसका मिश्रण 10% तक बढ़ाने तथा बायो-डीजल का उत्पादन करने की सरकार की योजना है। यह स्थिति पेट्रोलियम उद्योग में भारत की परिवर्तित होती स्थिति को प्रदर्शित करती है।

उल्लेखनीय है कि फरवरी, 2003 ई० में देश में कच्चे तेल के दो विशाल भण्डारों की खोज अलग-अलग कम्पनियों ने की थी। ये भण्डार बाड़मेर (राजस्थान) जिले में व मुम्बई के तटवर्ती क्षेत्र में खोजे गये हैं। कृष्णा-गोदावरी बेसिन में प्राकृतिक गैस के बड़े भण्डार की खोज के पश्चात् रिलायन्स इण्डस्ट्रीज लि० ने।

प्रकृतिक गैस के एक और भण्डार की खोज करने में सफलता प्राप्त की है। यह खोज मध्य प्रदेश में शहडोल. * कोलबेड मीथेन के सुहागपुर पश्चिम व सुहागपुर पूर्व अन्वेषण खण्ड में की गयी है।

रसायन उद्योग-रसायन उद्योग में मुख्य रसायन तथा इसके उत्पादों, पेट्रोकेमिकल्स, फर्टिलाइजर्स, पेंट तथा वार्निश, गैस, साबुन, इत्र, प्रसाधन सामग्री और फार्मस्युटिकल्स को शामिल किया जाता है। रसायन 5 के उत्पादन विभिन्न उद्योगों में प्रयुक्त होते हैं। इस प्रकार इस उद्योग का व्यावसायिक महत्त्व बहुत अ िहै। भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में भी इसका काफी योगदान है। देश की जी०डी०पी० में इसका योगदान 3 प्रतिशत है। 11वीं योजना में पेट्रोरसायन और रसायनों की वृद्धि 12.6 प्रतिशत और 8 प्रतिशत होने का अनुमान है। संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (यूनिडो) के अनुसार भारतीय रसायन उद्योग का विश्व में 6वाँ और एशिया में तीसरा स्थान है। 2010 में रसायन उद्योग 108.4 बिलियन डालर का रहा। रसायन उद्योग भारत के प्राचीनतम उद्योगों में से एक है जो देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है।

यह अत्यन्त विज्ञान आधारित है और विभिन्न लक्षित उत्पादों जैसे वस्त्र, कागज, पेंट एवं वार्निश, चमड़ा आदि के लिए मूल्यवान रसायन उपलब्ध कराता है, जिनकी जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यकता होती है। भारतीय रसायन उद्योग भारत की औद्योगिक एवं कृषिगत विकास के रीढ़ का निर्माण करता है और अनुप्रवाही उद्योगों के लिए घटकों को प्रदान करता है। भारतीय रसायन उद्योग में लघु एवं वृहद् स्तर की इकाइयाँ दोनों ही शामिल हैं। अस्सी के दशक के मध्य में लघु क्षेत्र को प्रदान किए गए वित्तीय रियायतों ने लघु स्तरीय उद्योगों (एसएसआई) के क्षेत्र में वृहद संख्या में इकाइयों को स्थापित करने के लिए बाध्य किया। वर्तमान में, भारतीय रसायन उद्योग क्रमिक रूप से व्यापक ग्राहकोन्मुखीकरण की ओर बढ़ रहा है। भारत को आधारभूत कच्चे माल की प्रचुरता का लाभ है, इसे वैश्विक प्रतियोगिता का सामना करने और निर्यात में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए तकनीकी सेवाओं और व्यापारिक क्षमताओं का निर्माण करना होगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था नब्बे के दशक के प्रारंभ तक एक संरक्षित अर्थव्यवस्था थी। रसायन उद्योग द्वारा बौद्धिक संपदा के सृजन के लिए व्यापक स्तर के शोध एवं विकास के लिए बहुत कम कार्य किए गए थे। इसलिए उद्योग को अंतर्राष्ट्रीय रसायन उद्योग की प्रतियोगिता का सफलतापूर्वक मुकाबला करने के लिए शोध एवं विकास में व्यापक निवेश करना होगा। विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों के साथ, देश की शक्ति दूसरे उच्च स्तरीय प्रशिक्षित वैज्ञानिक जनशक्ति पर निर्भर रहती है। भारत वृहद् संख्या में उत्कृष्ट एवं विशेषीकृत रसायनों का भी उत्पादन करता है जिनके विशिष्ट प्रयोग हैं जिनका खाद्य संयोजक, चमड़ा रंगाई, बहुलक संयोजक, रबड़ उद्योग में प्रति-उपयामक आदि में व्यापक प्रयोग होता है। रसायन क्षेत्र में, 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति है। रासायनिक उत्पादों, साथ-ही-साथ कार्बनिक/अकार्बनिक रंग-सामग्री और कीटनाशक के ज्यादातर निर्माता लाइसेंसमुक्त हैं। उद्यमियों को केवल आई ई एम को औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग के नियमों के अनुकूल काम करना होता है। बशर्ते कि स्थानीयता दृष्टिकोण लागू न हो। केवल निम्नलिखित वस्तुएँ ही अपनी खतरनाक प्रकृति के कारण आवश्यक लाइसेंसिंग सूची में शामिल हैं

  • हाइड्रोरासायनिक अम्ल एवं इसके संजात,
  • फॉस्जीन एवं इसके संजात तथा
  • हाइड्रोकार्बन के आइसोसाइनेट्स एवं डीआइसोसाइनेट्स।

प्रश्न 3.
भारत में परिवहन एवं दूरसंचार के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
या
राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम के घटकों का उल्लेख कीजिए।
या
इलेक्ट्रॉनिक मेल पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :

परिवहन

देश के निरन्तर विकास में सुचारु व समन्वित परिवहन-प्रणाली की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वर्तमान प्रणाली में यातायात के अनेक साधन; जैसे–रेल, सड़क, तटवर्ती नौ-संचालन, वायु-परिवहन इत्यादि पम्मिलित हैं। विगत वर्षों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास के साथ विस्तार भी हुआ है और क्षमता भी बढ़ी है, जिसका विवरण निम्नवत् है–

रेल–देश में माल ढोने और यात्री परिवहन का मुख्य साधन रेले हैं। आज देश भर में रेलों का एक व्यापक जाल बिछा हुआ है। रेलमार्ग की कुल लम्बाई 63,140 किमी है। 31 मार्च, 2002 ई० तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, भारतीय रेलवे के पास 7,739 इंजन, 39,236 यात्री डिब्बे व 2,16,717 माल डिब्बे थे तथा 31 मार्च, 2011 ई० तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, भारतीय रेलवे के पास 9,213 इंजन, 53,220 यात्री गाड़ियाँ व 6,493 अन्य सवारी गाड़ियों और 2,19,381 रेल के डिब्बे हैं।

वर्तमान में लगभग 25% रेलमार्ग व 36% कुल रेल पटरी का विद्युतीकरण हो चुका है। भारतीय रेलवे एशिया की सबसे बड़ी और संसार की चौथे नम्बर की रेलवे व्यवस्था है। वर्ष 1950-51 में रेल-यात्रियों की संख्या लगगे 13 करोड़ थी, जो वर्ष 2005-06 में बढ़कर 512 करोड़ हो गयी थी।

सड़क-भारत का सड़क नेटवर्क विश्व का तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। भारत के सड़क यातायात में प्रति वर्ष 10% की वृद्धि हो रही है। भारत में लगभग 33 लाख किलोमीटर लम्बा सड़क नेटवर्क है। वर्ष 1950-51 में यह नेटवर्क मात्र 4 लाख किलोमीटर था, जो अब 8 गुना से भी अधिक बढ़ गया है।

नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) के अन्तर्गत देश में सड़के नेटवर्क के समन्वित और सन्तुलित विकास पर बल दिया गया था। इस अवधि में सरकार ने व्यापक राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम (NHDP) भी आरम्भ किया, जिसमें पर्याप्त प्रगति हुई। दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) के दौरान सड़कों के विकास को देश की समग्र परिवहन-प्रणाली का अभिन्न अंग समझा गया, जिसमें तीन कार्यात्मक समूहों को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया गया। ये थे—प्राथमिक प्रणाली (राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेस मार्ग), अनुषंगी प्रणाली (राजमार्ग और प्रमुख जिला सड़कें) और ग्रामीण सड़कें।

दसवीं पंचवर्षीय योजना में केन्द्र क्षेत्र के सड़क कार्यक्रम के लिए है 59,490 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया था। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम के निम्नलिखित दो घटक हैं—

  1. चार महानगरों को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों से सम्बद्ध स्वर्ण चतुर्भुज योजना। इस घटक के अन्तर्गत कुल 5,846 किलोमीटर लम्बे राष्ट्रीय राजमार्ग सम्मिलित हैं।
  2. उत्तर-दक्षिण मार्ग (कॉरिडोर), जिसमें कोच्चि-सलेम स्पर मार्ग सहित श्रीनगर को कन्याकुमारी से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग और सिलचर को पोरबन्दर से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग सम्मिलित है। इन राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लम्बाई 7,300 किलोमीटर है। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत 4/6 लेन का निर्माण करके राजमार्गों की वहन क्षमता बढ़ाने के अलावा सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहन चलाने की दृष्टि से उनकी गुणवत्ता में सुधार के लिए कार्यक्रम शुरू किया है। इनके बन जाने से भारत के विशाल महानगरों के बीच समय एवं दूरी बहुत घट जाएगी।

दूरसंचार

दूरसंचार क्षेत्र में भारत की बदलती स्थिति सर्वविदित सराहनीय एवं सन्तोषप्रद है। दूरसंचार नेटवर्क के मामले में भारत का विश्व शीर्षस्थ देशों में स्थान हो गया है। नये दूरभाष कनेक्शनों में पर्याप्त वृद्धि हुई तथा राष्ट्रीय लम्बी दूरी और अन्तर्राष्ट्रीय लम्बी दूरी के दूरभाष टैरिफों में तथा सेल्युलर-से-सेल्युलर कालों पर राष्ट्रीय लम्बी दूरी के टैरिफ में अत्यधिक गिरावट आयी।

दूरसंचार क्षेत्र में निजी कम्पनियों के प्रवेश तथा इन कम्पनियों की गहन विपणन नीतियों के चलते देश में दूरभाष सेवा का तेजी से विकास हुआ है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार बीते वर्ष 2006 के अन्त में देश में दूरभाष उपभोक्ताओं की कुल संख्या लगभग 20 करोड़ थी। ऐसा माना जाता है कि अब भारत में हर छठे व्यक्ति के पास एक फोन है। देश के 20 करोड़ दूरभाष उपभोक्ताओं में 15 करोड़ उपभोक्ता मोबाइल दूरभाष के हैं। रिलायन्स इन्फो, टाटा इण्डिकॉम, एयरटेल, बी०एस०एन०एल०, आइडिया, वोडाफोन आदि कम्पनियाँ देश को मोबाइल फोन सेवाएँ उपलब्ध कराने में एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर कार्य कर रही हैं। भारत सदृश विकासशील देश में दूरदर्शन प्रसारण का विशेष महत्त्व है। भारत की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा विश्व के सबसे बड़े स्थानीय प्रसारण संगठमों में से एक है। देश में आज स्थलीय एवं उपग्रह, दोनों ही प्रसारण . सेवाएँ विद्यमान हैं।

दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितम्बर, 1959 ई० को किया गया था। सन् 1975 तक दूरदर्शन केवल कुछ नगरों तक ही सीमित था। आज देश के लगभग 8.2 करोड़ परिवारों में टेलीविजन उपलब्ध है। इसके 51% परिवार उपग्रहों से प्रसारित कार्यक्रमों को देखते हैं। संख्या की दृष्टि से राष्ट्रीय चैनल के दर्शकों की संख्या केबल दर्शकों से कहीं अधिक है।

भारत में अब दूरसंचार क्षेत्र के दो महत्त्वपूर्ण लक्ष्य हैं-यथासम्भव अधिकाधिक लोगों को निम्न लागत दर पर दूरभाष सेवा प्रदान करना तथा अधिकाधिक फर्मों को निम्न लागत वाली हाई स्पीड कम्प्यूटर नेटवर्क सेवा प्रदान करना। कम्प्यूटरों का उपयोग आज अनेक प्रकार से किया जा रहा है तथा समाज में इसकी भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

इलेक्ट्रॉनिक मेल – इलेक्ट्रॉनिक मेल सेवा, कम्प्यूटर आधारित ‘स्टोर एण्ड फॉरवर्ड’ सन्देश प्रणाली है। इसमें प्रेषक और प्रेषित दोनों को एक साथ उपस्थित रहने की आवश्यकता नहीं होती। यह सेवा डाटा संचार नेटवर्क के माध्यम से विभिन्न प्रकार के पत्रों का संचारण करती है। इस सेवा में कोई भी पत्र, स्मरण-पत्र, टेण्डर या विज्ञापन आदि टंकित कर उसे किसी भी व्यक्ति को उसके निर्धारित पते पर भेजा जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि पत्र भेजने तथा प्राप्त करने वाले दोनों नेटवर्क से जुड़े हों। ई-मेल वन-वे पद्धति है। यह दूरभाष की तरह दोनों ओर से वार्तालाप नहीं करा सकती, लेकिन उससे भी तीव्र गति से सूचना प्रदान करती है। अब यह सुविधा हिन्दी में भी उपलब्ध है। ‘वेब दुनिया के नाम से हिन्दी का पोर्टल भी इण्टरनेट पर आ चुका है और ई-पत्र की सहायता से हिन्दी भाषा में डाक भेजी व प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 4.
भारत में शिक्षा के बदलते स्वरूप का वर्णन निम्न शीर्षकों में कीजिए
(क) प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा, (ख) उच्च शिक्षा, (ग) तकनीकी शिक्षा।
या
भारत में शिक्षा के प्रसार पर स्वातन्त्र्योत्तर काल शिक्षा के वर्तमान स्वरूप पर एक लेख लिखिए।
उत्तर :

(क) प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा
प्राथमिक शिक्षा ऐसा आधार है जिस पर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास निर्भर करता है। हाल के वर्षों में भारत ने प्राथमिक शिक्षा में नामांकन, छात्रों की संख्या बरकरार रखने, उनकी नियमित उपस्थिति दर. और साक्षरता के प्रसार के संदर्भ में काफी प्रगति की है। जहाँ भारत की उन्नत शिक्षा पद्धति को भारत के आर्थिक विकास का मुख्य योगदानकर्ता तत्त्व माना जाता है, वहीं भारत में आधारभूत शिक्षा की गुणवत्ता, काफी चिन्ता का विषय है।

भारत में 14 साल की उम्र तक के सभी बच्चों को नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना सांवैधानिक प्रतिबद्धता है। देश की संसद ने वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ पारित किया है जिसके द्वारा 6 से 14 साल के सभी बच्चों के लिए शिक्षा एक मौलिक अधिकार हो गई है। हालांकि देश में अभी भी आधारभूत शिक्षा को सार्वभौम नहीं बनाया जा सका है। इसका अर्थ है–बच्चों का स्कूलों में सौ फीसदी नामांकन और स्कूलिंग सुविधाओं से लैस हर अधिवास में उनकी संख्या को बरकरार रखना। इसी कमी को पूरा करने हेतु सरकार ने वर्ष 2001 में सर्व शिक्षा अभियान योजना की शुरुआत की, जो अपनी तरह की दुनिया में सबसे बड़ी योजना है।

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में सूचना व संचार प्रौद्योगिकी शिक्षा क्षेत्र में वंचित और सम्पन्न समुदायों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, के बीच की दूरी पाटने का कार्य कर रहा है। भारत विकास प्रवेशद्वार ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भारत में मौलिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण हेतु प्रचुर सामग्रियों को उपलब्ध कराकर छात्रों तथा शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने की पहल की है।

माध्यमिक शिक्षा
प्रारम्भिक शिक्षा को सर्वव्यापी करना एक संवैधानिक अधिदेश बन गया है इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है। कि इस अभिकल्पना को माध्यमिक शिक्षा के सर्वव्यापी बनाने की ओर बढ़ाने की आवश्यकता है, जिसे कि बड़ी संख्या में विकसित देशों तथा कई विकासशील देशों में पहले ही हासिल कर लिया गया है। सभी युवा व्यक्तियों को अच्छी गुणवत्तायुक्त माध्यमिक शिक्षा सुलभ कराने तथा कम मूल्य पर उपलब्ध कराने की । केन्द्र सरकार की वचनबद्धता के भाग के रूप में भारत सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान माध्यमिक स्तर पर शिक्षा को सर्वव्यापी बनाने तथा गुणवत्ता-सुधार हेतु राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आर०एम०एस०ए०) नामक एक केन्द्रीय प्रायोजित स्कीम शुरू की गई। इस स्कीम का उद्देश्य प्रत्येक आवास से उचित दूरी के भीतर माध्यमिक स्कूल उपलब्ध कराकर 5 वर्ष के भीतर कक्षा में नामांकन हेतु नामांकन अनुपात को 75 प्रतिशत करने, सभी माध्यमिक स्कूलों द्वारा निर्धारित मानदण्डों के अनुपालन को | सुनिश्चित करके माध्यमिक स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, महिला-पुरुष सामाजिक-आर्थिक तथा विकलांगता-आधारित बाधाओं को दूर करना वर्ष 2017 अर्थात् 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक माध्यमिक स्तर की शिक्षा को सर्वव्यापी बनाने और वर्ष 2020 तक सभी बच्चों को विद्यालयों में बनाए रखना है। मुख्य रूप से भौतिक लक्ष्यों में 5 वर्षों के भीतर कक्षा IX.X हेतु नामांकन अनुपात को वर्ष 2005-06 के 52.26 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत करना, वर्ष 2011-12 तक अनुमानित 32.20 लाख : छात्रों के अतिरिक्त नामांकन हेतु सुविधाएँ उपलब्ध कराना, 44,000 मौजूदा माध्यमिक स्कूलों का सुदृढ़ीकरण, 11000 नए माध्यमिक स्कूल खोलना, 1.79 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति तथा 80,500 अतिरिक्त कक्षा-कक्षों का निर्माण शामिल था। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान परियोजना लागत का 75 प्रतिशत केन्द्र सरकार द्वारा वहन करने तथा शेष 25 प्रतिशत का वहन राज्य सरकारों द्वारा किये जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए हिस्सेदारी पैटर्न 50 : 50 होगा। 11वीं तथा 12वीं योजनाओं दोनों के लिए पूर्वोत्तर राज्य हेतु निधियम पैटर्न 90 : 10 रखा गया। 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान इस स्कीम हेतु 20,120 करोड़ आबंटित किए गए थे। वर्ष 2010-11, जो इस कार्यक्रम का दूसरा वर्ष था, में 34 राज्यों/संघराज्य क्षेत्रों से वार्षिक योजना प्रस्ताव प्राप्त हुए।

(ख) उच्च शिक्षा
आजादी के बाद के वर्षों में उच्च शिक्षा क्षेत्र की संस्थागत क्षमता में अत्यधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 1950 में विश्वविद्यालयों/विश्वविद्यालय स्तरीय संस्थाओं की संख्या 27 थी जो 18 गुणा बढ़कर वर्ष 2009 में 504 हो गई है। इस क्षेत्र में 42 केन्द्रीय विश्वविद्यालय, 243 राज्य विश्वविद्यालय, 53 राज्य निजी विश्वविद्यालय, 130 समविश्वविद्यालय, 33 राष्ट्रीय महत्त्व की संस्थाएँ (संसद के अधिनियमों के तहत स्थापित) और पाँच संस्थाएँ (विभिन्न राज्य विधानों के अंतर्गत स्थापित) शामिल हैं। कॉलेजों की संख्या में भी कई गुणा वृद्धि दर्ज की गई है जो 1950 में केवल 578 थे, 2011 में 30,000 से भी अधिक हो गए हैं।

उच्चतर शिक्षा क्षेत्र में हुई वृद्धि में विश्वविद्यालय बहुत तेजी से बढ़े हैं जो अध्ययन का सर्वोच्च स्तर है। यूनिवर्सिटी शब्द लैटिन के “युनिवर्सिटाज’ से लिया गया है, जिसका आशय है, “छात्रों और शिक्षकों के बीच विशेष समझौते।’ इस लैटिन शब्द का अभिप्राय अध्ययन की संस्थाओं से है जो अपने छात्रों को डिग्रियाँ प्रदान करते हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालय प्राचीन संस्थाओं से ज्यादा अलग नहीं हैं, इस बात को छोड़कर कि आजकल विश्वविद्यालये पढ़ाए गए विषयों और छात्रों दोनों के मामले में अपेक्षाकृत बड़े हैं। भारत में विश्वविद्यालय का आशय किसी केन्द्रीय अधिनियम, किसी प्रांतीय अधिनियम अथवा किसी राज्य अधिनियम के द्वारा स्थापित अथवा निगमित विश्वविद्यालय से है जिसमें इस अधिनियम के तहत इस संबंध में बनाए गए विनियमों के अनुसार उस सम्बद्ध विश्वविद्यालय के परामर्श से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थाएँ शामिल हैं। प्रतिवर्ष देश-विदेश के लाखों छात्र मुख्यतः अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए इनमें दाखिला लेते हैं जबकि लाखों छात्र बाहरी दुनिया में कार्य करने के लिए इन संस्थाओं को छोड़ते हैं। उच्च शिक्षा केन्द्र और राज्य दोनों की साझा जिम्मेदारी है। संस्थाओं में मानकों का समन्वय और निर्धारण केन्द्र सरकार का संवैधानिक दायित्व है। केन्द्र सरकार यूजीसी को अनुदान देती है और देश में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना करती है। केन्द्र सरकार ही यूजीसी की सिफारिश पर शैक्षिक संस्थाओं को समविश्वविद्यालय घोषित करती है। वर्तमान में, विश्वविद्यालयों/विश्वविद्यालय स्तरीय संस्थाओं के मुख्य घटक हैं—केन्द्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय, समविश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तरीय संस्थाएँ।

इनका वर्णन नीचे दिया गया है
केन्द्रीय विश्वविद्यालय :

  • केन्द्रीय अधिनियम द्वारा अथवा निगमित विश्वविद्यालय।

राज्य विश्वविद्यालय :

  • प्रांतीय अधिनियम द्वारा अथवा राज्य अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा निगमित विश्वविद्यालय।

निजी विश्वविद्यालय :

  • ऐसा विश्वविद्यालय जो किसी राज्य/केन्द्रीय अधिनियम के माध्यम से किसी प्रायोजक निकाय, अर्थात् सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 अथवा राज्य में उस समय लागू किसी अन्य संबंधित कानून के तहत पंजीकृत सोसायटी अथवा सार्वजनिक न्यास अथवा कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अंतर्गत पंजीकृत कंपनी द्वारा स्थापित किया गया है।

समविश्वविद्यालय :

  • विश्वविद्यालयवते संस्था, जिसे सामान्यतः समविश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, का आशय एक ऐसी उच्च-निष्पादने करने वाली संस्था से है जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) अधिनियम, 1956 की धारा 3 के अंतर्गत केन्द्र सरकार द्वारा उस रूप में घोषित किया है।

राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था :

  • संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित और राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था के रूप में घोषित संस्था।

राज्य विधानमंडल अधिनियम :

  • किसी राज्य विधानमंडल अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा के अंतर्गत संस्था निगमित कोई संस्था।

(ग) तकनीकी शिक्षा

भारत में तकनीकी शिक्षा का संचालन अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (All India Council for Technical Education/AICTE) द्वारा किया जाता है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् भारत में नई तकनीकी संस्थाएँ शुरू करने, नए पाठ्यक्रम शुरू करने और तकनीकी संस्थाओं में प्रवेश-क्षमता में फेरबदल करने हेतु अनुमोदन देती है। यह ऐसी संस्थाओं के लिए मानदंड भी निर्धारित करती है। इसकी स्थापना 1945 में सलाहकार निकाय के रूप में की गई थी और बाद में संसद के अधिनियम द्वारा 1987 में इसे सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया।

इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है, जहाँ इसके अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सचिव के कार्यालय हैं। कोलकाता, चेन्नई, कानपुर, मुम्बई, चण्डीगढ़, भोपाल और बंगलुरु में इसके 7 क्षेत्रीय कार्यालय स्थित हैं। हैदराबाद में एक नया क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित किया गया है। यह तकनीकी संस्थाओं के प्रत्यायन या कार्यक्रमों के माध्यम से तकनीकी शिक्षा के गुणवत्ता विकास को भी सुनिश्चित करती है। अपनी विनियामक भूमिका के अलावा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् की एक बढ़ावा देने की भी भूमिका है जिसे यह तकनीकी संस्थाओं को अनुदान देकर महिलाओं, विकलांगों और समाज के कमजोर वर्गों के लिए तकनीकी शिक्षा का विकास, नवाचारी, संकाय, अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने संबंधी योजनाओं के माध्यम से कार्यान्वित करती है। परिषद् 21 सदस्यों वाली कार्यकारी समिति के माध्यम से अपना कार्य करती है। 10 सांविधिक अध्ययन बोर्ड द्वारा सहायता प्राप्त है जो नामतः इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी में अवर स्नातक अध्ययन, इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी में स्नातकोत्तर और अनुसंधान, प्रबंध अध्ययन, व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, फार्मास्युटिकल शिक्षा, वास्तुशास्त्र, होटल प्रबंधन और कैटरिंग प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, टाउन एवं कंट्री पलैनिंग परिषद् की सहायता करते हैं।

प्रश्न 5.
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भारतीय कृषि में कौन-कौन-से बदलाव आये हैं? उक्ट स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारतीय कृषि में तकनीकी परिवर्तन 1960 के दशक में प्रारम्भ हुए, जब भारतीय कृषकों ने बीजों की अधिक उपज देने वाली किस्मों, रासायनिक खादों, मशीनीकरण, ऋण एवं विपणन सुविधाओं का उपयोग करना आरम्भ किया। केन्द्र सरकार ने सन् 1960 ई० में गहन क्षेत्र विकास कार्यक्रम आरम्भ किया। मैक्सिको में विकसित अधिक पैदावार देने वाले गेहूं के बीज तथा फिलीपीन्स में विकसित पान के बीज भारत लाए गए थे। अधिक उपज देने वाले बीजों के अतिरिक्त रासायनिक खादों और कीटनाशकों का उपयोग भी आरम्भ किया गया तथा सिंचाई की सुविधाओं में सुधार एवं विस्तार किया गया। इस प्रकार स्वतन्त्रता के बाद भारतीय कृषि में परिवर्तनों को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है

1. भूमि उपयोग में सुधार – देश के कुल 32.87 करोड़ हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में से 92.6% भूमि उपयोग के आँकड़े उपलब्ध हैं। राज्यों से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2000-01 में कुल 7.52% करोड़ हेक्टेयर (कुल क्षेत्रफल का 22.9%) में वन क्षेत्र था जबकि वर्ष 1950-51 में यह क्षेत्र 4.05 करोड़ हेक्टेयर था। इसी अवधि में बोई गई शुद्ध भूमि का क्षेत्र 11.9 करोड़ हेक्टेयर से बढ़कर 14.6 करोड़ हेक्टेयर हो गया था। फसलों के मोटे प्रारूप से संकेत मिलता है कि कुल फसल क्षेत्र में खाद्यान्न अन्य फसलों की तुलना में सबसे अधिक बोया जाता है, फिर भी वर्ष 1950-51 की अपेक्षा वर्ष 2000-01 में इसका तुलनात्मक भाग 76.7% से गिरकर 67.2% रह गया था। इसके साथ ही भूमि-सुधार हेतु खेतों की चकबन्दी की गई है जिससे कृषकों की भूमि को एक ही स्थान पर इकट्ठा करने के प्रयास किए गए हैं।

2. रासायनिक खादों की खपत तथा सिंचाई से वृद्धि – सिंचित क्षेत्र में वृद्धि और अधिक उपज देने वाले बीजों का प्रयोग बढ़ने के साथ-साथ रासायनिक खादों का उपयोग भी बढ़ रहा है। इनका उपयोग वर्ष 1950-51 के 69 हजार टन से बढ़कर वर्ष 2005-06 में 20.34 मीट्रिक टन हो गया है। इसी अवधि में रासायनिक खादों का प्रति हेक्टेयर उपभोग 2 किग्रा से बढ़कर 82 किग्रा हो गया है। कृषि विकास की नई नीति में सिंचाई सुविधाओं को प्राथमिकता दी गई है।
3. प्रमाणीकृत बीजों के वितरण में वृद्धि – सरकार ने बहुत पहले ही उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराने के महत्त्व को पहचान लिया था। सन् 1963 में उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराने की आवश्यकता को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय बीज निगम’ की स्थापना की गई है। पिछले कुछ वर्षों में देश भर में बीज प्रमाणीकरण संस्थाओं और बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं का जाल-सा बिछ गया है। प्रमाणीकृत बीजों के वितरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय बीज निगम के अतिरिक्त विश्व बैंक की सहायता से सन् 1969 ई० में स्थापित तराई विकास निगम ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास कर अपना योगदान दिया है।
4. जल प्रबन्धन – एक नई पहल के अन्तर्गत मार्च, 2002 से पूर्वी भारत में फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए खेत में जल का प्रबन्ध करने और उस पर केन्द्र द्वारा एक योजना आरम्भ की गई है। इस योजना का उद्देश्य भूमि के नीचे या भूमि की सतह पर मिलने वाले जल का दोहन और उस जल का समुचित उपयोग पूर्वी भारत में फसल की पैदावार बढ़ाने में करना है। यह योजना असोम, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मणिपुर, मिजोरम, ओडिशा व पश्चिम बंगाल के 9 जिलों और पूर्वी उत्तर प्रदेश के 35 जिलों में लागू की गई है।
5. कृषि अनुसन्धानों का विस्तार – भारत के कृषि मन्त्रालय के अन्तर्गत कृषि अनुसन्धान और शिक्षा विभाग कृषि, पशुपालन एवं मछली पालन के क्षेत्र में अनुसन्धान और शैक्षिक गतिविधियाँ संचालित करने के लिए उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त इनसे सम्बन्धित क्षेत्रों में कार्यरत राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सियों के विभिन्न विभागों एवं संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने में भी सहायता करता है। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् कृषि प्रौद्योगिकी के विकास, निवेश सामग्री तथा खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता लाने के लिए प्रमुख वैज्ञानिक जानकारियों को सामान्य जनता तक पहुँचाने में प्रमुख भूमिका निभायी है। यह परिषद् राष्ट्रीय स्तर की एक स्वायत्तशासी संस्था है। यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों के क्षेत्र में कृषि अनुसन्धान, शिक्षा एवं विस्तार शिक्षा को प्रोत्साहन देती है। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबन्धन, फसलों, पशुओं, मछली उत्पादन आदि में आ रही समस्याओं का समाधान करने के लिए पारम्परिक एवं अग्रणी क्षेत्रों में बुनियादी एवं व्यावहारिक खोजों व अनुसन्धानों में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेती है।
6. कृषि-साख और विभिन्न निगमों की स्थापना – कृषि क्षेत्र के लिए सरकार ने पर्याप्त मात्रा में कृषि ऋणों को उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किए हैं। इस दिशा में सहकारी समितियों, कृषि पुनर्वित्त निगम तथा कृषि वित्त निगम प्रयास कर रहे हैं। अब इस दिशा में सभी कार्य नाबार्ड (NABARD)–राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक को सौंप दिए गए हैं। सरकार ने सीमान्त एवं छोटे कृषकों के 10 हजार तक के ऋण माफ कर दिए हैं। कृषि विकास की नई नीति के अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों में निगमों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक विकास में कृषि का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :

औद्योगिक विकास में कृषि का योगदान

राष्ट्रीय आय में अंश – भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान पहले बहुत अधिक था, किन्तु वह धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। यह प्रवृत्ति इस बात की सूचक है कि भारत विकास की ओर अग्रसर है। वर्ष 1950-51 में यह योगदान 55.40% था, जो 2001-02 ई० में घटकर 26.1% रह गया।

रोजगार की दृष्टि से कृषि – देश की कुल श्रम-शक्ति का लगभग दो-तिहाई (64%) भाग कृषि एवं इससे सम्बन्धित उद्योग-धन्धों से अपनी आजीविका कमाता था। सी०डी०एस० आधार पर कृषि उद्योग में 1983 ई० में 5.135 करोड़ श्रमिक लगे हुए थे, जब कि वर्ष 1999-2000 में इन श्रमिकों की संख्या बढ़कर 19.072 करोड़ हो गयी।

औद्योगिक विकास में कृषि – भारत के प्रमुख उद्योगों को कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है। सूती और पटसन वस्त्र उद्योग, चीनी, वनस्पति, बागान आदि उद्योग प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। हथकरघा, बुनाई, तेल निकालना, चावल कूटना आदि बहुत-से लघु और कुटीर उद्योगों को भी कच्चा माल. कृषि से ही उपलब्ध होता है। अत: देश के औद्योगिक विकास में कृषि महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में कृषि – भारत के विदेशी व्यापार का अधिकांश भाग कृषि से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2002-03 में देश के निर्यात में कृषि वस्तुओं का अनुपात 11.9% था और कृषि से बनी हुई वस्तुओं; जैसे—निर्मित पटसन एवं कपड़ा; का अनुपात लगभग 25%। इस प्रकार भारत के कुल निर्यात में कृषि और उससे सम्बन्धित वस्तुओं का अनुपात लगभग 37% था। भारत के कृषि निर्यात में चावल और समुद्री उत्पाद का महत्त्व बढ़ रहा है। वर्ष 2002-03 में कृषि निर्यात में अकेले समुद्री उत्पाद का अंश 23.4% रहा है, जब कि चावल का अंश 13.6%। काजू का निर्यात-अंश 9.2% भी सराहनीय है।

प्रश्न 2.
भारत में चीनी उद्योग का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
चीनी उद्योग देश के प्रमुख कृषि पर आधारित उद्योगों में से एक है। कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों में सूती वस्त्र उद्योग के बाद चीनी उद्योग द्वितीय वृहत्तम उद्योग है। वर्ष 1950-51 में देश में चीनी मिलों की संख्या 138 थी, जो वर्ष 2000-01 में 493 तक पहुँच चुकी थी।

भारत विश्व में चीनी उत्पादन एवं उसकी खपत करने वाला सबसे बड़ा देश है। चीनी उत्पादन में अकेले महाराष्ट्र राज्य का योगदान एक-तिहाई से अधिक है। चीनी मिल की स्थापना के लिए पहले सरकार से लाइसेन्स प्राप्त करना अनिवार्य था, किन्तु 20 अगस्त, 1998 ई० को सरकार ने इस उद्योग को लाइसेन्स मुक्त करने की घोषणा कर दी। वर्तमान में भारत के पास लाखों टन चीनी का बफर स्टॉक उपलब्ध है। सरकार ने हाल ही में चीनी के निर्यात को डिकैनेलाइज़ (Decanalise) करने का निर्णय लिया है। इसके परिणामस्वरूप चीनी मिलें सीधे ही चीनी का निर्यात कर सकेंगी। पहले इसका निर्यात केवल इण्डियन शुगर ऐण्ड जनरल इण्डस्ट्री एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कॉपरिशन (ISGIEIC) के माध्यम से ही होता था। यह स्थिति चीनी उद्योग में भारत की वैश्विक सन्दर्भ में परिवर्तित होती स्थिति को प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 3.
मोबाइल दूरभाष पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
देश के 20 करोड़ दूरभाष उपभोक्ताओं में 15 करोड़ उपभोक्ता मोबाइल दूरभाष के हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2006 के अन्त में देश में मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या 15 करोड़ थी, जो अब दिन दोगुनी तथा रात चौगुनी बढ़ रही है। रिलायन्स इन्फो, टाटा इण्डिकॉम, एयरटेल, बी०एस० एन०एल०, भारती, बी०पी०एल०, आइडिया, वोडाफोन, एस्सार आदि कम्पनियाँ देश को मोबाइल फोन सेवाएँ उपलब्ध कराने में एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर कार्य कर रही हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ (लक्षण) निम्नलिखित है

  • भारतीय अर्थव्यवस्था मिश्रित प्रकृति वाली अर्थव्यवस्था है, जिसमें सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र को एक-दूसरे से अलग रखा गया है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था है, जिसमें कुल श्रम शक्ति का लगभग 70% भाग लगी हुआ है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था असन्तुलित अर्थव्यवस्था है। यह वर्ष 2004 की ‘विश्व विकास रिपोर्ट में कहा गया है। क्योंकि 70% कृषि पर आधारित कार्यशील जनसंख्या की तुलना में केवल 16% व्यक्ति ही उद्योग-धन्धों में तथा शेष 14% व्यक्ति व्यापार, परिवहन, संचार तथा अन्य कार्यों में लगे हुए हैं।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था निर्धनता वाली अर्थव्यवस्था है जिसकी कुल जनसंख्या का 26.1% भाग (2003-04) अभी भी निर्धनता रेखा के नीचे है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजी का अभाव पाया जाता है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आय कम होने के . कारण वास्तविक आय भी कम हो जाती है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था में औद्योगीकरण का अभाव अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास में एक बड़ी बाधा है।
  • भारत में प्रति व्यक्ति आय अत्यधिक निम्न (अमेरिका के प्रति व्यक्ति आय का 1/75वाँ भाग) है।
  • भारत में धन एवं आय के वितरण में उल्लेखनीय असमानता पायी जाती है। धनवानों और निर्धनों में अन्तराल बढ़ता ही जा रहा है।
  • भारत में जनाधिक्य की समस्या आर्थिक विकास में एक बहुत बड़ी बाधा है, क्योंकि संसाधन उस अनुपात में नहीं बढ़ पा रहे हैं।
  • भारत में बाजार की अपूर्णताएँ भी स्पष्ट रूप में देखी जाती हैं। यहाँ व्यावसायिक गतिशीलता का अभाव है तथा आर्थिक क्रियाओं में आशातीत विशिष्टीकरण भी नहीं हो पा रहा है।
  • भारत में बहुत-से व्यक्ति अपनी आय को सामाजिक कुरीतियों पर ही व्यय कर देते हैं जिससे अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • भारत में आवागमन तथा संचार के साधनों का यथोचित विकास नहीं हो पाने के कारण आर्थिक असन्तुलन यथावत् बना हुआ है।

प्रश्न 5.
नयी औद्योगिक नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
सन् 1991 ई० की नवीन औद्योगिक नीति से उदारीकरण के अनेक उपायों की घोषणा की गई। इस नीति के अनुसार आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के काल में औद्योगिक क्रियाकलापों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बहुत प्रोत्साहन दिया गया। उदारीकरण की नीति के प्रमुख उपाय थे—निवेश सम्बन्धी बाधाएँ हटा दी गईं, व्यापार को बन्धनमुक्त कर दिया गया, कुछ क्षेत्रों में विदेशी प्रौद्योगिकी आयात करने की छूट दी गई, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (विनियोग) की अनुमति दी गई, पूँजी बाजार में पहुँच की बाधाओं को हटा दिया गया, औद्योगिक लाइसेंस पद्धति को सरल एवं नियन्त्रण मुक्त कर दिया गया, सार्वजनिक क्षेत्र के सुरक्षित क्षेत्र को घटा दिया गया तथा सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ चुने हुए उपक्रमों का विनिवेशीकरण किया गया अर्थात् इन्हें निजी कम्पनियों को बेच दिया गया। दसवीं योजना (2002-07) में औद्योगिक उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ग्यारहवीं योजना (2007-12) में औद्योगिक विकास का लक्ष्य 9% रखा गया। यह योजना मार्च, 2012 को समाप्त हो गई। वर्ष 2012-17 के लिए 1 अप्रैल, 2012 से 12वीं पंचवर्षीय योजना प्रारम्भ हुई। इसमें औद्योगिक विकास का लक्ष्य 9.6 प्रतिशत रखा गया है।

प्रश्न 6.
भारत में ‘बौद्धिक सम्पदा के क्षेत्र में की गयी प्रगति का वर्णन कीजिए।
या
‘बौद्धिक सम्पदा’ से आप क्या समझते हैं ? इस पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर :
क्ति का सर्वांगीण विकास अर्थात् शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक विकास पर्याप्त सीमा तक तकनीकी शिक्षा पर आधारित है। व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास तब ही पूर्ण माना जाता है जब उसमें जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास करने की क्षमता उत्पन्न हो जाए। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा व्यक्ति को प्रत्येक क्षेत्र में विकसित होने का अवसर प्रदान करती है। यह शारीरिक श्रम के माध्यम से मानसिक शक्तियों का विकास करते हुए व्यक्ति को चिन्तन, मनन, सत्यापन आदि के अवसर प्रदान करती है, जिससे उसका बौद्धिक विकास होता है। उदाहरण के लिए किसी विद्यार्थी में योग्यता एवं तकनीकी कौशल का विकास होने पर उसमें आत्मनिर्भरता की शक्ति भी पैदा होती है।

आज भारत ने ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में प्रगति कर देश में उपलब्ध संसाधनों का भरपूर उपयोग किया है। जैव प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं यन्त्रीकरण, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य देखभाल, दूर संवेदी उपग्रह प्रणाली, सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों के विकास में भारत अपनी बौद्धिक सम्पदा के बल पर ही आगे कदम बढ़ा रहा है। इण्टरनेट अत्यन्त उच्च तकनीक वाला उद्योग है, जिसमें नयी उपलब्धियों का प्रयोग और पुरानी का लोप दोनों ही बड़ी तेज रफ्तार से होता है। इससे कुछ नयी परिस्थितियाँ भी जन्मी हैं। इनमें पहली पेटेण्ट और बौद्धिक सम्पदा के अधिकारों से सम्बन्धित है। सॉफ्टवेयर चुम्बकीय माध्यम में अंकित रहता है और इसीलिए इसका हस्तान्तरण तथा नकल बड़ी आसानी से हो जाता है। इस कारण पेटेण्ट और बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की रक्षा का काम बेहद कठिन हो गया है। नवीं पंचवर्षीय योजना अवधि में दो नयी योजनाएँ अर्थात्

  • बौद्धिक सम्पदा अधिकार अध्ययन के बारे में वित्तीय सहायता योजना और
  • कॉपीराइट मामलों पर संगोष्ठी तथा कार्यशाला आयोजन आरम्भ की गयी। बौद्धिक सम्पदा अधिकार अध्ययन की वित्तीय सहायता योजना का उद्देश्य बौद्धिक सम्पदा अधिकार

सम्बन्धी मामले के बारे में शिक्षाविद् समुदाय में सामान्य जागरूकता उत्पन्न करना और विश्व विद्यालय तथा अन्य मान्यता प्राप्त संस्थानों में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के बारे में अध्ययनों को प्रोत्साहित करना है। भारत विश्व बौद्धिक सम्पदा संगठन का सदस्य है, जो कॉपीराइट तथा अन्य बौद्धिक सम्पदा अधिकारों से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र संघ की एक विशिष्ट एजेन्सी है। भारत इनकी सभी चर्चाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था किस पर आधारित है ?
उत्तर :
वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था ‘वैश्वीकरण’ या उदारीकरण’ की प्रक्रिया पर आधारित है।

प्रश्न 2.
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि के घटते योगदान से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता हैं ?
उत्तर :
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि के घटते योगदान से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत विकास की ओर अग्रसर है।

प्रश्न 3.
भारत में कृषि की महत्त्वपूर्ण क्रान्तियों के नाम लिखिए।
उत्तर :
हरित क्रान्ति तथा पीली क्रान्ति।

प्रश्न 4.
छः आधारभूत उद्योगों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
छ: आधारभूत उद्योग इस प्रकार हैं-बिजली, कोयला, इस्पात, कच्चा पेट्रोलियम, पेट्रोलियम रिफाइनरी तथा सीमेण्ट।

प्रश्न 5.
सरकार ने कपड़ा उद्योग को कब लाइसेन्स मुक्त किया था ?
उत्तर :
सरकार ने कपड़ा उद्योग को वर्ष 1993 ई० में लाइसेन्स मुक्त किया था।

प्रश्न 6.
लोहा व इस्पात उद्योग में कितनी पूँजी लगी हुई है तथा कितने लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है ?
उत्तर :
लोहा व इस्पात उद्योग में है 90,000 करोड़ की पूँजी लगी हुई है तथा 5 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है।

प्रश्न 7.
भारतीय कोयला उद्योग का संचालन एवं नियन्त्रण करने वाले संस्थानों के नाम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारतीय कोयला उद्योग को संचालन एवं नियन्त्रण सार्वजनिक क्षेत्र के दो प्रमुख संस्थानों-कोल इण्डिया लि० (CIL) तथा सिंगरैनी कोइलरीज द्वारा किया जा रहा है।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण का क्या अर्थ है ? [2010]
उत्तर :
किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ समन्वय ही वैश्वीकरण कहलाता है। इसे भूमण्डलीकरण या विश्वव्यापीकरण भी कहा जाता है। यह द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यापार एवं वित्तीय समझौते से भिन्न ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के द्वारा विश्व स्तर पर उपलब्ध आर्थिक अवसरों से लाभान्वित होने का विचार अन्तर्निहित है।

प्रश्न 9.
भारत में वैश्वीकरण की प्रक्रिया कब आरम्भ हुई ?
उत्तर :
भारत में वैश्वीकरण की प्रक्रिया सन् 1991 ई० में आरम्भ हुई। इस प्रक्रिया को तत्कालीन प्रधानमन्त्री पी०वी० नरसिंहराव तथा वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में क्रियान्वित किया गया।

प्रश्न 10.
वैश्वीकरण से होने वाले दो लाभ लिखिए।
उत्तर :
वैश्वीकरण से होने वाले दो लाभ निम्नलिखित हैं

  • वैश्वीकरण या उदारीकरण से उठाए गए कदमों के कारण संचार के क्षेत्र में कम दामों में उत्तम सेवाएँ प्राप्त हुईं।
  • इसमें औद्योगिक क्षेत्र में, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में, कम्प्यूटर एवं खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में भारी सफलता देश को प्राप्त हुई।

बहुविकल्पीय प्रश्

1. भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था में स्थान है
(क) पहला
(ख) चौथा।
(ग) सातवाँ
(घ) तीसरा

2. ‘कृष्ण क्रान्ति सम्बन्धित है
(क) तेल उत्पादन से
(ख) केरोसिन उत्पादन से
(ग) पेट्रोल उत्पादन से
(घ) खनिज तेल उत्पादन से

3. ‘शिक्षा-एक मौलिक अधिकार को किस संशोधन द्वारा पारित किया गया?
(क) 93वाँ संशोधन
(ख) 92वाँ संशोधन
(ग) 85वाँ संशोधन
(घ) 91वाँ संशोधन

4. देश के सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का योगदान कितना प्रतिशत है?
(क) 24%
(ख) 25%
(ग) 26%
(घ) 27%

5. भारत का कितना प्रतिशत कृषि क्षेत्रफल वर्षा पर निर्भर करता है?
(क) 50%
(ख) 55%
(ग) 60%
(घ) 65%

6. भारत की राष्ट्रीय आय का कितना प्रतिशत कृषि से प्राप्त होता है?
(क) 25%
(ख) 28%
(ग) 30%
(घ) 33%

7. भारत में रॉकेट प्रक्षेपण का केन्द्र है
(क) पोखरन
(ख) ट्रॉम्बे
(ग) मुम्बई
(घ) श्रीहरिकोटा

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (घ), 3. (क), 4. (ग), 5. (ग), 6. (क), 7. (क)

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