UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi शैक्षिक निबन्य

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi शैक्षिक निबन्य

शैक्षिक निबन्ध

नयी शिक्षा-नीति

सम्बद्ध शीर्षक

  • आधुनिक शिक्षा प्रणाली : एक मूल्यांकन
  • वर्तमान शिक्षा प्रणाली के गुण और दोष
  • बदलती शिक्षा नीति का छात्रों पर प्रभाव (2013)
  • शिक्षा का गिरता मूल्यगत स्तर [2015]
  • वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में सुधार [2015]
  • आधुनिक शिक्षा-प्रणाली : गुण-दोष [2016]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना
  2. अंग्रेजी शासन में शिक्षा की स्थिति,
  3. स्वतन्त्रता के पश्चात् की स्थिति,
  4. शिक्षा-नीति का उद्देश्य,
  5. नयी शिक्षा नीति की विशेषताएँ,
  6. नयी शिक्षा नीति की समीक्षा,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना-शिक्षा मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का सवोत्तम साधन है। प्राचीन शिक्षा-व्यवस्था मानव को उच्च-आदर्शों की उपलब्धि के लिए अग्रसर करती थी और उसके वैयक्तिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के सम्यक् विकास में सहायता करती थी। शिक्षा को यह व्यवस्था हर देश और काल में तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन-सन्दर्भो के अनुरूप बदलती रहनी चाहिए। भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है, जिसे सन 1835 ई० में लागू किया गया था। अंग्रेजी शासन की गलत शिक्षा-नीति के कारण ही हमारा देश स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी पर्याप्त विकास नहीं कर सका।

अंग्रेजी शासन में शिक्षा की स्थिति–सन् 1835 ईस्वी में जब वर्तमान शिक्षा प्रणाली की नींव रखी गयी थी तब लॉर्ड मैकाले ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि, “अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य भारत में प्रशासन को बिचौलियों की भूमिका निभाने तथा सरकारी कार्य के लिए भारत के लोगों को तैयार करना है। इसके फलस्वरूप एक सदी तक अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के प्रयोग में लाने के बाद भी सन् 1935 ई० में भारत साक्षरता के 10% के आँकड़े को भी पार नहीं कर सका। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भी भारत की साक्षरता मात्र 13% ही थी। इस शिक्षा प्रणाली ने उच्च वर्गों को भारत के शेए समाज से पृथक् रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसकी बुराइयों को सर्वप्रथम गाँधी जी ने सन् 1917 ई० में ‘गुजरात एजुकेशन सोसाइटी’ के सम्मेलन में उजागर किया तथा शिक्षा में मातृभाषा के स्थान और हिन्दी के पक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर तार्किक ढंग से रखा।

स्वतन्त्रता के पश्चात् की स्थिति-स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत में ब्रिटिशकालीन शिक्षा-पद्धति में परिवर्तन के कुछ प्रयास किये गये। इनमें सन् 1968 ई० की राष्ट्रीय शिक्षा नीति उल्लेखनीय है। सन् 1976 ई० में भारतीय संविधान में संशोधन के द्वारा शिक्षा को समवर्ती-सूची में सम्मिलित किया गया, जिससे शिक्षा का एक राष्ट्रीय और एकात्मक स्वरूप विकसित किया जा सके। भारत सरकार ने विद्यमान शैक्षिक व्यवस्था का पुनरावलोकन किया और राष्ट्रव्यापी विचार-विमर्श के बाद 26 जून, सन् 1986 ई० को नयी शिक्षा नीति की घोषणा की।

शिक्षा-नीति का उद्देश्य-इस शिक्षा नीति का गठन देश को इक्कीसवीं सदी की ओर ले जाने के नारे के अंगरूप में ही किया गया है। नये वातावरण में मानव संसाधन के विकास के लिए नये प्रतिमानों तथा नये मानकों की आवश्यकता होगी। नये विचारों को रचनात्मक रूप में आत्मसात् करने में नयी पीढ़ी को सक्षम होना चाहिए। इसके लिए बेहतर शिक्षा की आवश्यकता है। साथ ही नयी शिक्षा नीति का उद्देश्य आधुनिक तकनीक की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए उच्चस्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त श्रम-शक्ति को जुटाना है; क्योंकि इस शिक्षा-नीति के आयोजकों के विचार से इस समय देश में विद्यमान श्रम-शक्ति यह आवश्यकता पूरी नहीं कर सकती।

नयी शिक्षा-नीति की विशेषताएँ–
(i) नवोदय विद्यालय-नयी शिक्षा-नीति के अन्तर्गत देश के विभिन्न भागों में विशेषकर ग्रामीण अंचलों में नवोदय विद्यालय खोले जाएँगे, जिनका उद्देश्य प्रतिभाशाली छात्रों को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करना होगा। इन विद्यालयों में राष्ट्रीय पाठ्यक्रम लागू होगा।

(ii) रोजगारपरक शिक्षा-नवोदय विद्यालयों में शिक्षा रोजगारपरक होगी तथा विज्ञान और तकनीक उसके आधार होंगे। इससे विद्यार्थियों को बेरोजगारी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

(iii) 10 +2 +3 को पुनर्विभाजन-इन विद्यालयों में शिक्षा 10 + 2 + 3 पद्धति पर आधारित होगी। ‘त्रिभाषा फार्मूला’ चलेगा, जिसमें अंग्रेजी, हिन्दी एवं मातृभाषा या एक अन्य प्रादेशिक भाषा रहेगी। सत्रार्द्ध प्रणाली (सेमेस्टर सिस्टम) माध्यमिक विद्यालयों में लागू की जाएगी और अंकों के स्थान पर विद्यार्थियों को ग्रेड दिये जाएँगे।

(iv) समानान्तर प्रणाली
-नवोदय विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की एक समानान्तर शिक्षा-प्रणाली शुरू की जाएगी।

(v) अवलोकन-व्यवस्था–
केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद् शिक्षा-संस्थानों पर दृष्टि रखेगी। एक अखिल भारतीय शिक्षा सेवा संस्था का गठन
होगा। माध्यमिक शिक्षा के लिए एक अलग संस्था गठित होगी।

(vi) उच्च शिक्षा में सुधार-
अगले दशक में महाविद्यालयों से सम्बद्धता समाप्त करके उन्हें स्वायत्तशासी बनाया जाएगा। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षा का स्तर सुधारा जाएगा तथा शोध के उच्च स्तर पर बल दिया जाएगा।

(vii) आवश्यक सामग्री की व्यवस्था-
प्राथमिक विद्यालयों में ‘ऑपरेशन ब्लैक-बोर्ड (Operation Blackboard) लागू होगा। इसके अन्तर्गत प्रत्येक विद्यालय के लिए दो बड़े कमरों का भवन, एक छोटा-सा पुस्तकालय, खेल का सामान तथा शिक्षा से सम्बन्धित अन्य साज-सज्जा उपलब्ध रहेगी। शिक्षा-मन्त्रालय ने प्रत्येक विद्यालय के लिए आवश्यक सामग्री की एक आकर्षक और प्रभावशाली सूची भी बनायी है। प्रत्येक कक्षा के लिए एक अध्यापक की व्यवस्था की गयी है।

(viii) मूल्यांकन और परीक्षा सुधार–
हाईस्कूल स्तर तक किसी को भी अनुत्तीर्ण नहीं किया जाएगा। परीक्षा में अंकों के स्थान पर ‘ग्रेड प्रणाली’ प्रारम्भ की जाएगी। छात्रों की प्रगति का आकलन क्रमिक मूल्यांकन द्वारा होगा।

(ix) शिक्षकों को समान वेतनमान–देश भर में अध्यापकों को समान कार्य के लिए समान वेतन के आधार पर समान वेतन मिलेगा। प्रत्येक जिले में शिक्षकों के प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये जाएँगे।

(x) मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना-नयी शिक्षा-नीति के अन्तर्गत सम्पूर्ण देश के पैमाने पर एक मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है। इस मुक्त विश्वविद्यालय का दरवाजा सबके लिए खुला रहेगा; न तो उम्र का कोई प्रतिबन्ध होगा और न ही समय का कोई बन्धन।।

(xi) नयी शिक्षा नीति के अन्तर्गत निजी क्षेत्र के व्यवसायी यदि चाहें तो आवश्यकता के अनुरूप शिक्षण-संस्थान खोल सकेंगे।

नयी शिक्षा-नीति की समीक्षा-वर्तमान शिक्षा प्रणाली में जो अनेकशः दोष हैं उनकी अच्छी -खासी चर्चा सरकारी परिपत्र ‘Challenges of Education : A Policy Perspective’ में की गयी है। इस शिक्षा प्रणाली से संस्कृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं का भविष्य अन्धकारमय होकर रह गया है। इसके अन्तर्गत केवल अंग्रेजी का ही बोलबाला होगा; क्योंकि इसके लागू होने के साथ-साथ पब्लिक स्कूलों को समाप्त नहीं किया गया है। फलतः इस नीति की घोषणा के बाद देश में अंग्रेजी माध्यम वाले मॉण्टेसरी स्कूलों की गली-कूचों में बाढ़-सी आ गयी है। शिक्षा पर अयोग्य राजनेता दिनोंदिन नवीन प्रयोग कर रहे हैं, जिससे लाभ के स्थान पर हानि हो रही है। शिक्षा के प्रश्न को लेकर बहुधा अनेकों गोष्ठियाँ, सेमिनार आदि आयोजित किये जाते हैं किन्तु परिणाम देखकर आश्चर्य होता है कि शिक्षा प्रणाली सुधरने के बजाय और अधिक निम्नकोटि की होती जा रही है। वस्तुत: भ्रष्टाचार के चलते अच्छे व समर्पित शिक्षा अधिकारी जो संख्या में इक्का-दुक्का ही हैं; उनके सुझावों का प्राय: स्वागत नहीं किया जाता। शिक्षा नीति के अन्तर्गत पाठ्यक्रम भी कुछ इस प्रकार का निर्धारित किया गया है कि एक के बाद दूसरी पीढ़ी के आ जाने तक भी न उसमें कुछ संशोधन होता है, न ही परिवर्तन। पिष्टपेषण की यह प्रवृत्ति विद्यार्थियों में शिक्षा के प्रति अश्रद्धा जगाती है।

निश्चित ही हमारी अधुनातन शिक्षा-नीति, पद्धति, व्यवस्था एवं ढाँचा अत्यन्त दोषपूर्ण सिद्ध हो चुका है। यदि इसे शीघ्र ही न बदला गया तो हमारा राष्ट्र हमारे मनीषियों के आदर्शों की परिकल्पना तक नहीं पहुँच सकेगा।

उपसंहार-नयी शिक्षा नीति के परिपत्र में प्रत्येक पाँच वर्ष के अन्तराल पर शिक्षा नीति के कार्यान्वयन और मानदण्डों की समीक्षा की व्यवस्था की गयी है; किन्तु सरकारों में जल्दी-जल्दी हो रहे परिवर्तनों से इस नयी शिक्षा नीति से नवीन अपेक्षाओं और सुधारों की सम्भावनाओं में विशेष प्रगति नहीं हो पायी है। साथ ही यह शिक्षा नीति एक सुनियोजित व्यवस्था, साधन सम्पन्नता और लगन की माँग करती है। यदि नयी शिक्षा-नीति को ईमानदारी और तत्परता से कार्यान्वित किया जाए तो निश्चय ही हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ सकेंगे।

छात्र और अनुशासन

सम्बद्ध शीर्षक

  • छात्रों में अनुशासनहीनता : कारण और निदान
  • जीवन में अनुशासन का महत्त्व
  • विद्यार्थी-जीवन में अनुशासन का महत्व (2016)
  • अनुशासन और हम
  • विद्यार्थी जीवन के सुख-दुःख
  • छात्र जीवन में अनुशासन का महत्त्व [2015]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2.  विद्यार्थी और विद्या,
  3. अनुशासन का स्वरूप और महत्त्व,
  4. अनुशासनहीनता के कारण—(क) पारिवारिक कारण; (ख) सामाजिक कारण; (ग) राजनीतिक कारण; (घ) शैक्षिक कारण,
  5. निवारण के उपाय,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना–विद्यार्थी देश का भविष्य हैं। देश के प्रत्येक प्रकार का विकास विद्यार्थियों पर ही निर्भर है। विद्यार्थी जाति, समाज और देश का निर्माता होता है, अत: विद्यार्थी का चरित्र उत्तम होना बहुत आवश्यक है। उत्तम चरित्र अनुशासन से ही बनता है। अनुशासन जीवन का प्रमुख अंग और विद्यार्थी-जीवन की आधारशिला है। व्यवस्थित जीवन व्यतीत करने के लिए मात्र विद्यार्थी ही नहीं प्रत्येक मनुष्य के लिए अनुशासित होना अति आवश्यक है। अनुशासनहीन विद्यार्थी व्यवस्थित नहीं रह सकता और न ही उत्तम शिक्षा ग्रहण कर सकता है। आज विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की शिकायत सामान्य-सी बात हो गयी है। इससे शिक्षा-जगत् ही नहीं, अपितु सारा समाज प्रभावित हुआ है और निरन्तर होता ही जा रहा है। अत: इस समस्या के सभी पक्षों पर विचार करना उचित होगा।

विद्यार्थी और विद्या–-‘विद्यार्थी’ का अर्थ है–‘विद्या का अर्थी’ अर्थात् विद्या प्राप्त करने की कामना करने वाला। विद्या लौकिक या सांसारिक जीवन की सफलता का मूल आधार है, जो गुरुकृपा से प्राप्त होती है। इससे विद्यार्थी-जीवन के महत्त्व का भी पता चलता है, क्योंकि यही वह समय है, जब मनुष्य अपने समस्त भावी जीवन की सफलता की आधारशिला रखता है। यदि यह काल व्यर्थ चला जाये तो सारा जीवन नष्ट हो जाता है।

संसार में विद्या सर्वाधिक मूल्यवान् वस्तु है, जिस पर मनुष्य के भावी जीवन का सम्पूर्ण विकास तथा सम्पूर्ण उन्नति निर्भर करती है। इसी कारण महाकवि भर्तृहरि विद्या की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि “विद्या ही मनुष्य का श्रेष्ठ स्वरूप है, विद्या भली-भाँति छिपाया हुआ धन है (जिसे दूसरा चुरा नहीं सकता)। विद्या ही सांसारिक भोगों को, यश और सुख को देने वाली है, विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेश जाने पर विद्या ही बन्धु के सदृश सहायता करती है। विद्या ही श्रेष्ठ देवता है। राजदरबार में विद्या ही आदर दिलाती है, धन नहीं; अत: जिसमें विद्या नहीं, वह निरा पशु है।’

फलतः इस अमूल्य विद्यारूपी रत्न को पाने के लिए इसका मूल्य भी उतना ही चुकाना पड़ता है और वह है तपस्या। इस तपस्या का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कवि कहता है-

सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्या, विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥

तात्पर्य यह है कि सुख की इच्छा वाले को विद्या कहाँ और विद्या की इच्छा वाले को सुख कहाँ ? सुख की इच्छा वाले को विद्या की कामना छोड़ देनी चाहिए या फिर विद्या की इच्छा वाले को सुख की कामना छोड़ देनी चाहिए।

अनुशासन का स्वरूप और महत्त्व-‘अनुशासन’ का अर्थ है बड़ों की आज्ञा (शासन) के पीछे (अनु) चलना। जिन गुरुओं की कृपा से विद्यारूपी रत्न प्राप्त होता है, उनके आदेशानुसार कार्य किये बिना विद्यार्थी की उद्देश्य-सिद्धि भला कैसे हो सकती है ? ‘अनुशासन’ का अर्थ वह मर्यादा है जिसका पालन ही विद्या प्राप्त करने और उसका उपयोग करने के लिए अनिवार्य होता है। अनुशासन का भाव सहज रूप से विकसित किया जाना चाहिए। थोपा हुआ अथवा बलपूर्वक पालन कराये जाने पर यह लगभग अपना उद्देश्य खो देता है। विद्यार्थियों के प्रति प्रायः सभी को यह शिकायत रहती है कि वे अनुशासनहीन होते जा रहे हैं, किन्तु शिक्षक वर्ग को भी इसका कारण ढूंढ़ना चाहिए कि क्यों विद्यार्थियों की उनमें श्रद्धा विलुप्त होती जा रही है।

अनुशासन का विद्याध्ययन से अनिवार्य सम्बन्ध है। वस्तुत: जो महत्त्व शरीर में व्यवस्थित रुधिर-संचार का है, वही विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन का है। अनुशासनहीन विद्यार्थियों को पग-पग पर ठोकर और फटकार सहनी पड़ती है।

अनुशासनहीनता के कारण-वस्तुतः विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता एक दिन में पैदा नहीं हुई है। इसके अनेक कारण हैं, जिन्हें मुख्यत: निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा जा सकता है
(क) पारिवारिक कारण-बालक की पहली पाठशाला उसका परिवार है। माता-पिता के आचरण का बालक पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आज बहुत-से ऐसे परिवार हैं, जिनमें माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं या अलग-अलग व्यस्त रहते हैं और अपने बच्चों की ओर ध्यान देने हेतु उन्हें अवकाश नहीं मिलता। इससे बालक उपेक्षित होकर विद्रोही बन जाता है। दूसरी ओर अधिक लाड़-प्यार से भी बच्चा बिगड़कर निरंकुश या स्वेच्छाचारी हो जाता है। कई बार पति-पत्नी के बीच कलह या पारिवारिक अशान्ति भी बच्चे के मन पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है और उसका मन अध्ययन-मनन से विरक्त हो जाता है। इसी प्रकार बालक को विद्यालय में प्रविष्ट कराकर अभिभावकों का निश्चिन्त हो जाना, उसकी प्रगति या विद्यालय में उसके आचरण की खोज-खबर न लेना भी बहुत घातक सिद्ध होता है।

(ख) सामाजिक कारण–विद्यार्थी जब समाज में चतुर्दिक् व्याप्त भ्रष्टाचार, घूसखोरी, सिफारिशबाजी, भाई-भतीजावाद, चीजों में मिलावट, फैशनपरस्ती, विलासिता और भोगवाद, अर्थात् प्रत्येक स्तर पर व्याप्त अनैतिकता को देखता है तो उसका भावुक मन क्षुब्ध हो उठता है, वह विद्रोह कर उठता है। और अध्ययन की उपेक्षा करने लगता है।

(ग) राजनीतिक कारण-छात्र-अनुशासनहीनता का एक बहुत बड़ा कारण राजनीति है। आज राजनीति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर छा गयी है। सम्पूर्ण वातावरण को उसने इतना विषाक्त कर दिया है कि स्वस्थ वातावरण में साँस लेना कठिन हो गया है। नेता लोग अपने दलीय स्वार्थों की पूर्ति के लिए विद्यार्थियों को नौकरी आदि के प्रलोभन देकर पथभ्रष्ट करते हैं, छात्र-यूनियनों के चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल पैसा खर्च करते हैं तथा विद्यार्थियों को प्रदर्शन और तोड़-फोड़ के लिए उकसाते हैं। विद्यालयों में हो रहे इस राजनीतिक हस्तक्षेप ने अनुशासनहीनता की समस्या को और भी बढ़ा दिया है।

(घ) शैक्षिक कारण-छात्र-अनुशासनहीनता का कदाचित् सबसे बड़ा कारण यही है। अध्ययन के लिए आवश्यक अध्ययन-सामग्री, भवन, सुविधाजनक छात्रावास एवं अन्यान्य सुविधाओं का अभाव, सिफारिश, भाई-भतीजावाद या घूसखोरी आदि कारणों से योग्य, कर्तव्य-परायण एवं चरित्रवान् शिक्षकों के स्थान पर अयोग्य, अनैतिक और भ्रष्ट अध्यापकों की नियुक्ति, अध्यापकों द्वारा छात्रों की कठिनाइयों की उपेक्षा करके ट्यूशन आदि के चक्कर में लगे रहना या आरामतलबी के कारण मनमाने ढंग से कक्षाएँ लेना या न लेना, छात्र और अध्यापकों की संख्या में बहुत बड़ा अन्तर होना, जिससे दोनों में आत्मीयता को सम्बन्ध स्थापित न हो पाना; परीक्षा-प्रणाली का दूषित होना, जिससे विद्यार्थी की योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं हो पाना आदि छात्र-अनुशासनहीनता के प्रमुख कारण हैं। परिणामस्वरूप अयोग्य विद्यार्थी योग्य विद्यार्थी पर वरीयता प्राप्त कर लेते हैं। फलतः योग्य विद्यार्थी आक्रोशवश अनुशासनहीनता में लिप्त हो जाते हैं।

निवारण के उपाय-यदि शिक्षकों को नियुक्त करते समय सत्यता, योग्यता और ईमानदारी का आकलन अच्छी प्रकार कर लिया जाये तो प्रायः यह समस्या उत्पन्न ही न हो। प्रभावशाली, गरिमामण्डित, विद्वान् और प्रसन्नचित्त शिक्षक के सम्मुख विद्यार्थी सदैव अनुशासनबद्ध रहते हैं, क्योंकि वह उस शिक्षक के हृदय में अपना स्थान एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में बनाना चाहते हैं।

पाठ्यक्रम को अत्यन्त सुव्यवस्थित व सुनियोजित, रोचक, ज्ञानवर्धक एवं विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए। पाठ्यक्रम में आज भी पर्याप्त असंगतियाँ विद्यमान हैं, जिनका संशोधन अनिवार्य है; उदाहरणार्थ-इण्टरमीडिएट हिन्दी काव्यांजलि की कविताएँ ही बी० ए० द्वितीय वर्ष के हिन्दी पाठ्यक्रम में भी हैं। क्या कवियों का इतना अभाव है कि एक ही रचना वर्षों तक पढ़ने को विवश किया जाये।

छात्र-अनुशासनहीनता के उपर्युक्त कारणों को दूर करके ही हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। सबसे पहले वर्तमान पुस्तकीय शिक्षा को हटाकर प्रत्येक स्तर पर उसे इतना व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए कि शिक्षा पूरी करके विद्यार्थी अपनी आजीविका के विषय में पूर्णतः निश्चिन्त हो सके। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी के स्थान पर मातृभाषा हो। ऐसे योग्य, चरित्रवान् और कर्तव्यनिष्ठ अध्यापकों की नियुक्ति हो, जो विद्यार्थी की शिक्षा पर समुचित ध्यान दें। विद्यालय या विश्वविद्यालय प्रशासन विद्यार्थियों की समस्याओं पर पूरा ध्यान दें तथा विद्यालयों में अध्ययन के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाये। विद्यालयों में प्रवेश देते समय गलत तत्त्वों को कदापि प्रवेश न दिया जाये। किसी कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या लगभग 50-55 से अधिक न हो। शिक्षा सस्ती की जाये और निर्धन, किन्तु योग्य छात्रों को नि:शुल्क उपलब्ध करायी जाये। परीक्षा-प्रणाली स्वच्छ हो, जिससे योग्यता का सही और निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके। इसके साथ ही राजनीतिक हस्तक्षेप बन्द हो, सामाजिक भ्रष्टाचार मिटाया जाये, सिनेमा और दूरदर्शन पर देशभक्ति की भावना जगाने वाले चित्र प्रदर्शित किये जाएँ तथा माता-पिता बालकों पर समुचित ध्यान दें और उनका आचरण ठीक रखने के लिए अपने आचरण पर भी दृष्टि रखें।

उपसंहार—छात्रों के समस्त असन्तोषों का जनक अन्याय है, इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से अन्याय को मिटाकर ही देश में सच्ची सुख-शान्ति लायी जा सकती है। छात्र-अनुशासनहीनता का मूल भ्रष्ट राजनीति, समाज, परिवार और दूषित शिक्षा-प्रणाली में निहित है। इनमें सुधार लाकर ही हम विद्यार्थियों में व्याप्त अनुशासनहीनता की समस्या का स्थायी समाधान ढूँढ़ सकते हैं; क्योंकि विद्यार्थी विद्यालय में पूर्णत: विद्यार्जन के लिए ही आते हैं, मात्र हुल्लड़बाजी के लिए नहीं।

व्यावसायिक शिक्षा के विविध आयाम

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2. व्यावसायिक शिक्षा की आवश्यकता,
  3. व्यावसायिक शिक्षा के उद्देश्य-(अ) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास; (ब) जीवन की तैयारी; (स) ज्ञान का जीवन से सहसम्बन्ध; (द) व्यावसायिक एवं आर्थिक विकास; (च) राष्ट्रीय विकास और व्यावसायिक शिक्षा; (छ) शिक्षा का व्यवसायीकरण; (ज) व्यावसायिक शिक्षा का आयोजन–(i) पूर्णकालिक नियमित व्यावसायिक शिक्षा, (ii) अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा, (iii) अभिनव पाठ्यक्रम द्वारा व्यावसायिक शिक्षा, (iv) पत्राचार द्वारा व्यावसायिक शिक्षा,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना-अर्थव्यवस्था किसी भी समाज के विकास की संरचना में महत्त्वपूर्ण होती है। समाजरूपी शरीर का मेरुदण्ड उसकी अर्थव्यवस्था को ही समझा जाता है। समाज की अर्थव्यवस्था उसके व्यावसायिक विकास पर निर्भर करती है। जिस समाज में व्यवसाय का विकास नहीं होता, वह सदैव आर्थिक परेशानियों में घिरा रहता है। व्यावसायिक शिक्षा इसी व्यवसाय सम्बन्धी तकनीकी, वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्षों के क्रमबद्ध अध्ययन को कहा जाता है। इसके अन्तर्गत किसी व्यवसाय के लिए अनिवार्य तकनीकियों एवं विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित ज्ञान प्रदान किया जाता है।

व्यावसायिक शिक्षा की आवश्यकता-वैदिक काल से लेकर ब्राह्मण और बौद्ध काल तक धर्म, काम और मोक्ष को ही शिक्षा के प्रमुख अंगों के रूप में मान्यता प्रदान की गयी थी। अंग्रेजों के शासन काल में भी व्यावसायिक शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। अंग्रेजी सरकार भारत का औद्योगिक विकास न करके इंग्लैण्ड में स्थापित उद्योगों को प्रोत्साहित करना चाहती थी, जिससे वह भारत से कच्चा माल ले जाकर वहाँ से उत्पादित माल ला सके और यहाँ के बाजारों में उसे ऊँचे मूल्य पर बेच सके। इससे भारत का दोहरा शोषण हो रहा था। ब्रिटिश सरकार भारत को स्वावलम्बी बनाना भी नहीं चाहती थी। उसे भय था कि यदि भारत तकनीकी दृष्टि से सशक्त हो गया तो ब्रिटेन में उत्पादित माल भारत में नहीं बिकेगा और उसे यहाँ से कच्चा माल भी नहीं मिल पाएगा।

व्यावसायिक शिक्षा के अभाव को पर्याप्त समय तक अन्य देशों के प्राविधिक सहयोग पर ही निर्भर रहना पड़ा। उन्नते देशों से ऋण लेकर भी तकनीकी क्षेत्र में स्वावलम्बी होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं किया जा सका है। दूसरों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण राष्ट्र की मुद्रा का पर्याप्त ह्रास होता है। इसीलिए व्यावसायिक शिक्षा का विकास राष्ट्र की उन्नति की प्राथमिक आवश्यकता है।

व्यक्ति का सर्वांगीण विकास भी तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के विकास द्वारा ही सम्भव हो सकता है। उसका शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक विकास पर्याप्त सीमा तक तकनीकी शिक्षा पर ही आश्रित है।

व्यावसायिक शिक्षा के उद्देश्य-व्यावसायिक शिक्षा, शिक्षा की उपयोगिता और उसके उद्देश्यों को पूरी तरह से स्पष्ट करने में सक्षम है। वास्तव में व्यावसायिक शिक्षा का विकास मानवीय पूर्णता के लिए हुआ है। व्यावसायिक शिक्षा के उद्देश्यों को हम निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं–

(अ) व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास–व्यक्ति के व्यक्तित्व को तभी पूर्ण माना जाता है जब उसमें जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास करने की क्षमता उत्पन्न हो जाए। यदि व्यक्ति जीवन के किसी भी क्षेत्र में पिछड़ जाता है तो उसका व्यक्तित्व पूर्ण नहीं माना जा सकता। व्यावसायिक शिक्षा व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकसित होने का अवसर प्रदान करती है। व्यावसायिक शिक्षा शारीरिक श्रम के माध्यम से निरीक्षण, कल्पना, तथ्य-संकलन, नियमन, स्मरण एवं संश्लेषण-विश्लेषण आदि सभी मानसिक शक्तियों का विकास करते हुए शिक्षार्थी को चिन्तन, मनन, तर्क एवं सत्यापन आदि के अवसर प्रदान करती है, जिससे उसका बौद्धिक विकास होता है। विद्यार्थी में किसी व्यवसाय से सम्बन्धित योग्यता एवं कौशल का विकास होने पर आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त उसमें आत्मनिर्भरता की शक्ति भी पैदा होती है।

(ब) जीवन की तैयारी-व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से युवक भावी जीवन के लिए तैयार होता है। वह अपने तथा अपने परिवार के जीवन-यापन के लिए आवश्यक व्यावसायिक योग्यताओं एवं कौशलों को विकसित करने तथा उन्हें प्रयुक्त करने की दृष्टि से सक्षम हो पाता है। आने वाले जीवन में वह संघर्षों के मध्य पिस न जाए इसके लिए भी वह व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से ही शक्ति अर्जित करता है।

(स) ज्ञान का जीवन से सहसम्बन्ध-जो ज्ञान जीवन का अंग नहीं बनता वह निरर्थक और त्याज्य है। जब ज्ञान जीवन का अंग बन जाता है तब वह व्यावहारिक रूप धारण कर लेता है। यदि हमने अपने अर्जित ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में प्रयुक्त नहीं किया तथा उससे लाभ नहीं उठाया तो हम साक्षर तो कहला सकते हैं, लेकिन शिक्षित नहीं कहे जा सकते। व्यावसायिक शिक्षा द्वारा अर्जित ज्ञान जीवन का अंग बन जाता है। वास्तव में वही ज्ञान जीवन का अंग बनता है, जो स्वानुभवों पर आधारित होता है। व्यावसायिक शिक्षा से प्राप्त ज्ञान स्वानुभवों पर टिका होने के कारण जीवन का अंग बन जाता है।

(द) व्यावसायिक एवं आर्थिक विकास–शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त कोई व्यक्ति किसी व्यवसाय को अपना सके तथा उत्तम जीवन व्यतीत करने के लिए सुख-सुविधाओं का संचय कर सके, यह सामर्थ्य शिक्षा द्वारा उत्पन्न की जानी चाहिए। स्वावलम्बी बनना और अपने स्तर को उन्नत बनाना प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य है।

(च) राष्ट्रीय विकास और व्यावसायिक शिक्षा-व्यावसायिक शिक्षा राष्ट्र के उपलब्ध साधनों को विवेकपूर्ण विधि से उपयोग में लाने का दृष्टिकोण भी उत्पन्न करती है। भारत अभी भी खाद्य-पदार्थों, उपभोग की वस्तुओं, उद्योग तथा व्यवसाय को उन्नत करने से सम्बन्धित सुविधाओं एवं बेरोजगारी की समस्या का समाधान निकालने की दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं बन सका है। यदि हमारा देश दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं को स्वयं तैयार कर लेता है तो इससे राष्ट्रीय मुद्रा की बचत होती है तथा देश की आर्थिक समृद्धि भी बढ़ती है। व्यावसायिक शिक्षा इस दृष्टि से हमें सशक्त बनाती है।

(छ) शिक्षा का व्यवसायीकरण-देश की स्वतन्त्रता के 63 वर्षों के बाद भी हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था उसी प्रकार बनी हुई है, जैसी वह अंग्रेजी शासनकाल में थी। आज का शिक्षित युवक बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त है। उसकी शिक्षा न तो उसे और न ही समाज को कोई लाभ पहुँचा रही है। इसका कारण यह है कि अभी तक हमारी शिक्षा का व्यवसायीकरण नहीं किया जा सका है। यदि माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था कर दी जाए तो निश्चित ही बेरोजगारी की समस्या को हल किया जा सकता है।

(ज) व्यावसायिक शिक्षा का आयोजन-व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए हम निम्नलिखित उपाय अपना सकते है–
(i) पूर्णकालिक नियमित व्यावसायिक शिक्षा पूर्णकालिक नियमित व्यावसयिक शिक्षा का आयोजन निम्नलिखित स्तरों पर किया जा सकता है
(अ) निम्न माध्यमिक स्तर पर-कक्षा 7 तथा कक्षा 8 के पश्चात् स्कूल छोड़ने वाले बालकों के लिए निम्नलिखित पाठ्यक्रम को आधार बनाया जा सकता है

  • औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में ऐसे पाठ्यक्रम चलाना, जिनमें प्राथमिक शिक्षा प्राप्त छात्र प्रवेश ले सके।
  • औद्योगिक सेवाओं के लिए प्राथमिक शिक्षा प्राप्त छात्रों को प्रशिक्षण देना। इससे उनकी श्रम सम्बन्धी कुशलता बढ़ेगी और वे निरक्षर श्रमिकों की अपेक्षा अच्छा कार्य कर सकेंगे।
  • ऐसा प्रशिक्षण देना कि छात्र कक्षा 8 उत्तीर्ण करने के बाद घर पर ही कोई उद्योग या व्यवसाय चला सके। गाँवों के कृषि सम्बन्धी व्यवसाय इसके अच्छे उदाहरण हैं।
  • लड़कियों को गृहविज्ञान के माध्यम से कुछ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए; जैसेसिलाई, कढ़ाई आदि का प्रशिक्षण। इनका प्रशिक्षण प्राप्त करके लड़कियाँ विवाह के बाद भी इन्हें व्यवसाय के रूप में अपना सकती हैं।
  • स्कूलों में बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम चलाये जाएँ। उन्हें आठवीं कक्षा तक इस प्रकार चलाया जाए कि छात्र/छात्राएँ किसी बेसिक शिल्प में कुशलता प्राप्त कर लें।

(ब) उच्च माध्यमिक स्तर पर-इस स्तर पर कक्षा 8 और हाईस्कूल उत्तीर्ण छात्र व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकते हैं। व्यावसायिक शिक्षा निम्नलिखित दो प्रकार से व्यवस्थित की जा सकती है
(1) पृथक् व्यावसायिक स्कूलों में प्रशिक्षण देकर।
(2) सामान्य शिक्षा के साथ-साथ कोई व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

  • पॉलिटेक्निक स्कूलों में व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था करके।
  • औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के प्रचलित पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण देकर।
  • बहु-उद्देशीय पाठ्यक्रम के शिल्प या व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाकर।
  • जूनियर टेक्निकल हाईस्कूलों में प्रवेश देकर।।
  • बहु-उद्देशीय पाठ्यक्रम और जूनियर टेक्निकल स्कूलों के पाठ्यक्रम में समन्वय स्थापित करके।
  • सामान्य शिक्षा के साथ किसी शिल्प का प्रशिक्षण देकर।
  • स्वास्थ्य, वाणिज्य और प्रशासन के उपयुक्त पाठ्यक्रम चलाकर।।

(ii) अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा-कुछ छात्र किन्हीं कारणों से प्राथमिक शिक्षा, कक्षा 8 या हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पढ़ना छोड़ देते हैं और घरेलू व्यवसायों में लग जाते हैं। अपनी जीविका की व्यवस्था में लगे होने के कारण वे नियमित शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। ऐसे व्यक्तियों के लिए स्थानीय व्यावसायिक विद्यालयों में अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा दी जा सकती है। इस शिक्षा की मान्यता नियमित शिक्षा के समान होनी चाहिए।
अंशकालिक व्यावसायिक शिक्षा प्राथमिक, माध्यमिक स्तर पर समान रूप से प्रदान की जा सकती है। इन प्रशिक्षणार्थियों को नियमित प्रशिक्षणार्थियों के समान मान्य परीक्षा में बैठाया जा सकता है।

(iii) अभिनव पाठ्यक्रम द्वारा व्यावसायिक शिक्षा-किसी स्थान विशेष अथवा देश की आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न संस्थानों द्वारा नवीनतम व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर आधारित प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

(iv) पत्राचार द्वारा व्यावसायिक शिक्षा अधिकाधिक लोगों को व्यावसायिक शिक्षा सुलभ कराने की दृष्टि से पत्राचार शिक्षा का विशेष महत्त्व है। वर्तमान समय में देश के अनेक विश्वविद्यालय एवं संस्थान विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में पत्राचार शिक्षा की सुविधा प्रदान कर रहे हैं।

उपसंहार-इस प्रकार हम देखते हैं कि औद्योगिक विकास के इस युग में किसी राष्ट्र या उसके नागरिक के विकास के लिए व्यावसायिक शिक्षा की महत्त्वपूर्ण उपयोगिता है। यद्यपि भारत में व्यावसायिक शिक्षा के इस महत्त्व को समझकर इसके विकास हेतु विगत दो दशक से अधिक ध्यान दिया जा रहा है तथापि इसका जितना विकास यहाँ होना चाहिए, वह अभी तक नहीं हो सका है। आवश्यकता इस बात की है कि इस सम्बन्ध में जागरूकता उत्पन्न की जाए।

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